अब ऐसा भी नही है कि इस कार्य मे हमी हम हो ,नही जी हमारे सहयोगी भी कम नही थे ,हमेशा तैयार रहते थे की कोई मौका तो दे पंगा हाजिर ,मै विडिओ विभाग देखता था,मोर्या जी आडियो ,दोनो ही साथ साथ अनुसंधान से भी जुडे थे,यानी खर भिश्ती पीर बावर्ची सभी का काम हमे ही करना होता था अपने अपने विभाग का,दोनो का केबिन साथ साथ था.दोनो ही मस्त मौला थे,दोनॊ ही अपने काम मे किसी की राय के सख्त खिलाफ़,दोनॊ हॊ किसी की जी हजूरी से बेतहाशा चिढने वाले,पक्के दोस्त थे हम दोनो, कुछ मामलो मे मेरे गुरु भी,आखिर वो अपट्रान के रेडियो डिवीजन के पुराने चावल जो थे.
कपूर जी जो सेल्स विभाग मे एकजीक्यूटिव थे, उन्हे अपने बास को पालिंश करना और उपर चढाये रखने मे महारत हासिल थी . वे भी हम लोगो को तुच्छ समझते थे अपने बास की तरह,लेकिन पता नही क्यो छुप छिपाकर हमसे दोस्ती भी दर्शाते रहते रहते थे,उन्हे भी अपने को दूसरो से अलग और उंचा दिखाने का इस कदर शौक था ,जब भी वो किसी टूर से वापस आते (सेल्स वालो को अकसर आफ़िस मे बैठने नही दिया जाता ,उन्हे महिने मे ३५ दिन बाहर भेजने की पूरी कोशिशे होती है) समय निकाल कर हमारे पास जरूर आते और आते ही थोडी देर खडे होते दाये मुडते बाये मुडते ,पैर को इधर उधर नचाते रहते,कभी उंग्लियो के बल खडे होते और कभी एडी के बल, हम दोनो (मै और मोर्या जी एक दूसरे को देख कर मुसकुराते रहते पर उनकी तरफ़ ना देखते,अच्छा अरोरा जी मै चलता हू कह कर कपूर साहब थोडा सा लगंडाहट लिये हुये आगे तक जाते (जब वो आये थे बिलकुल ठीक चल रहे थे) फ़िर लौट आते बडी आशा भरी नजरो के साथ, मै एक काम था आपसे वो भूल ही गया था.
अब तक मोर्या जी मुझे बनावटी गुस्से से आखे तरेर कर फ़ुसफ़ुसाने लगते अरे तुम्हे शर्म नही आती तुम्हारा दोस्त नये जूते दिखाने को घंटे भर से परेशान है और तुम उसे सता रहे हो अब क्या अगला नये जूते दिखाने के चक्कर मे पैर कट्वा ले ?
और अक्सर मोर्या जी ही पूछ बैठते कपूर साहब पैर मे क्या हो गया है,क्या टूर मे कही चोट खा बैठे,
"नही आगरा गया था वहा से चार पांच जोडी नये जूते ले लिये थे,आज पहने है तो जरा काट रहे थे,"कपूर साहब प्रफ़ुल्लित मनोदगार वयक्त कर रहे थे
अरे जूते तो बहुत शानदार है ,कपूर साहब आपकी पसंद का जवाब नही,मुझे भी लग रहा था कि जूते बिलकुल नये है,यहा तो आसपास इतनी अच्छी चीज मिलती नही ..(जैसे हम यहा उनके जूते देखने ही बैठे हो)
अब कपूर साहब हमे ये बताते हुये कि उन्हे ए क्लास वस्तूये ही भाती है धीरे धीरे निकल लेते. लैब मे दिन भर हमारे हसने का जरिया रहते बेचारे कपूर साहब ?
कुछ दिनो बाद कपूर साहब को लुधियाना जाना पडा.वहा उन्हे चिरागदीन की चिप्पी लगी शर्टे मिल गई (उन दिनो लगभग सारे बडे लोग यहा तक के हमारे मालिकान भी चिरागदीन की काटन की शर्टे पहनते थे)बस जी कपूर साहब ने हमारा जीना हराम कर दिया अब चाहे जाये वो शिकारपुर ही जाये ,पर आते ही चिराग दीन की (चिप्पी लगी) नई शर्ट पहनी और हमे दिखाने और बताने आ जाते कि वो कितने सोफ़िस्केटिड प्राणी है, मै अगर चिरागदीन के अलावा कुछ और पहनले तो बदन पर दाने निकल आते है,ये हमे उन्होने ही बताया ,
तब ब्राण्डेड का इतना ज्यादा चलन नही था,रेडीमेट का चलन पैर पसारने लगा था लेकिन विमल ,मफ़तलाल, एस कुमार,डी सी एम का भी अपना नाम काफ़ी होता था,
ये वो जमाना था जब लोग तली हुई चिप्स पापड और घी से किनारा करके खाने की मेज पर विदेशी बटर आयल की २०० ग्राम की बोतल रख अपना स्टेटस दिखाया करते थे.
खैर जी हम दोनो इस उनके बढे स्टेटस से बहुत दुखी थे कि उन्हे कैसे सुधारा जाये,आखिर मोर्या जी ने एक दिन शाम को मुझे साथ लिया ,दोनो एक दर्जी के पास पहुचे उससे पूछा कि घूट्टने (घूट्टना यानी घूट्नो तक आने वाला पट्टे का कच्छा) मे कितना कपडा लगता है, और बनियान मे कितना ? कपडे वाले की दुकान पर पहुचे और विमल का एक लाईनिंग वाला शर्ट का कपडा लेकर दर्जी को दिया,वो भी इस आदेश के साथ कि विमल लिखी हुई आधे आधे इंच की पट्टी निक्कर और बनियान की साईड के दोनो तरफ़ सिलाई से बाहर झाकती रहे ,दो जोडी सिल दो.
,मैने मोर्या जी से पूछा कि आप सूती के बजाय ये टेरीकाट /पोलियेस्टर के कच्छे किसलिये सिलवा रहो हो गर्मी का समय है,दुखी हो जाओगे.
तुम देखते रहो इस बार तुम्हारे दोस्त का ऐसा इलाज करने वाला हू कि अगले तीन चार महीने तो हमारी तरफ़ आना ही भूल जायेगा.
और यही किया मोर्या जी ने,जैसे ही दो चार दिन बाद कपूर जी पधारे मोर्या जी अचानक बडे मिलनसार दिखाई देने लगे ,उन्होने जम कर कपूर साहब की और उनके कपडो जूतो यहा तक की बनियान और मौजे की भी तारीफ़ कर डाली ,वे भी बताने लगे कि हर आदमी को हर चीज सूट नही करती,अब इसके लिये चाहे महंगी चीजे ही खरीदनी पडे,लेकिन मजबूरी होती है ,कुछ लोगो की स्किन इतनी सोफ़्ट होती है कि वोह हर कही से ली हुई वस्तूये नही धारण कर सकते जैसे हमारे अरोरा जी कुछ भी पहन लेते है,कही से भी खरीद लेते है,
कपूर साहब भी इन बातो मे हा मे हा मिलाते हुये अपनी नयी टाई जेब से निकाल कर दिखाने लगे जो वोह महेंद्र नगर (नेपाल ) से लाये थे.दोनो लोग एक दूसरे से इतने सहमत दिखाई दिये कि हमे खुंदक आने लगी
लेकिन तभी मोर्या जी ने तुरुप का इक्का चल दिया उन्होने घोषणा की, कि वो चाहे कुछ भी खाले कुछ भी पहन ले ,लेकिन उन्हे कच्छा और बनियान विमल का ही सूट करता है ,
"अच्छा विमल के अंडर गारमेंट्स भी आते है ! आपको गलत फ़हमी है, कोई दुकानदार नकली बेच कर आपको बेवकूफ़ बन रहा है,मैने आज तक कही नही देखे,आप मुझे बताये कहा से मिलते है ,विमल के अंदर गारमेंट्स आते हो और मुझे या कुमार साहब को ना पता हो ये हो ही नही सकता," कपूर जी ने फ़रमाया
भईया ये बहुत महंगे शौक है हर कोई इनको अफ़ोर्ड नही कर सकता, मेरे तो जूते तक कशमीरी भेड की खाल के आते है मेरी मजबूरी है मेरे शरीर को घटिया चीजे सूट ही नही करती , मुझे तो निक्कर बनियान भी लखनऊ के एक खास दर्जी से सिलवाने पडते है .यकीन नही आता .तो देख लो और मोर्याजी ने बाकायदा शर्ट उतार कर, पेंट उतार कर घुटनो तक के निक्कर और बनियान के किनारी पर विमल की साईड स्ट्रिप दिखा कर ही सांस लिया, और इनमे सारी सिलाई हाथ से होती है ,एक निक्कर को तैयार होने मे दो तीन दिन लग जाते है,
अब कपूर साहब को समझ मे आ रही थी कि मोर्या जी आज अचानक इतने भले क्यो बने हुये थे.
मोर्या जी ने उन्हे अचानक उन्ही की भाषा मे अन्सोफ़िस्केटिड,और सामान्य वस्तुये रखने वाला बंदा बना दिया था,जिसे वो समझ भी रहे थे कि उन्हे थप्पड मारा गया है वो भी बहुत ढंग से योजना बद्ध तरीके से,लेकिन अभी तक मिलाई गई हा मे हा के कारण वो कुछ कह भी नही सकते थे ,लिहाजा थोडॊ देर इधर उधर की हाक कर मोर्या जी की तारीफ़ मेकसीदे पढते हुये जो गये वाकई मे महिनो नही आये हमे ही उन्हे ढूढना पडता था,