Friday, March 14, 2008

"कैसे प्रसिद्ध हो एक खोज" और विचारो की स्वतंत्रता

आज हम अपनी खोज को अचानक बीच मे विराम देकर इस नये तरीके के बारे मे लिखने पर मजबूर है,वैसे हम इसको प्रसिद्ध होने के अन्तिम तरीके के रूप में ही मानते है.(आज हमने अपना सारा ज्ञान एक ही पोस्ट मे उड़ेल दिया है लंबाई की शिकायत ना करे)

देखिये सबसे सस्ता और तुरंत फ़ुरंत प्रसिद्धी देने वाला यह तरीका उन के लिये मुफ़ीद है जिनका ब्रम्ह वाक्य "बदनाम होगे तो क्या नाम ना होगा" होता है,लेकिन कई बार शिखर पर पहुचे लोग भी इस प्रकार के कार्य अपनी प्रसिद्दी को और अधिक बढाने के चक्कर मे करते है जैसे भारत के सबसे महंगे पेंटर हुसैन,या कुछ जाने माने बड़े पत्रकार ब्लोगर्स (हमारे लिये दोनो ही बडे लोग है जी)

कुल मिलाकर आप जब भी इस और जाना चाहे काशी के अस्सी,और मंटो,लोलिता को पढ लें, ताकी अगर कोई आप पर उंगली उठाये तो उसे धमकाने के के लिये आप उदाहरण दे सके,(जैसे अगर आपकी धर्म पत्नी आपको किसी के साथ पकड ले तो आप उसे समझा सकते है कि आप भारत के पहले प्रधान मंत्री नेहरू जी ,अमेरिका के राष्ट्रपति क्लिंटन भी ऐसा ही करते थे,चाहे तो ये पढले) साथ मे कुछ सडक के किनारे पटरी पर मिलने वाली मस्तराम (मस्तराम कपूर नही) की पीली किताबो का भी अध्ययन कर डाले. अब दो चार दिन आप शाम को किसी भी देसी दारू के ठेके पर जाये ,बोतल ले (मसालेदार या सादी ये आपकी मर्जी है ) साथ मे बने "दारू पीने का सरकारी अहाता" मे पहुचे और कम से कम दो से ती्न घंटे बिताये. अब आप इस ट्रेनिंग के दो तीन दिन बाद शाम को जब बोतल आधी खाली हो जाये ,तुरंत लिखना चालू करदे अब आप जो भी लिखेगे यकीन मानिये कालजयी होगा .आपको भी स्वतंत्रता की अनुभूति होगी और आपकी स्वतंत्रता के बारे मे पढने वालो को भी .अब दो चार लोगो से अपने ऊपर कमेंट्स कराये ना हो तो खुद ही करले .जवाब दे और चाहे तो पुन: गरियाकर अपनी स्वतंत्रता का दुबारा डंका पीट दे,तो ये तो हुई शुरुआत.वैसे आप यहा जो जो कर सकते है मै उनको क्रमबद्ध कर देना चाहता हू.

१) आप हिंदू देवी देवताओ को गरिया सकते है..यहा ये बात ध्यान देने काबिल है इस धर्म मे ढेरो देवी देवता है ,तो आधे हिन्दू तो ये सोच लेगे कि जिनको गरियाया वो देवता मेरे वाले नही है लेकिन आपके ब्लोग पर वो जरूर आयेंगे ,टिपियायेगे बेशक नही .(ये लोग खामखा पंगा नही लेते,इसी कारण तो दो हजार साल का गुलामी का गौरव पूर्ण इतिहास है इनका) फ़िर काफ़ी सारे स्वनाम धन्य लेखक आपके साथ (जिनको गाजा पट्टी की ,हुसैन साहब की,या वाटर पिक्चर वाली मेमसाहब की चिंता रहती है) लिखने की स्वतंत्रता के नाम पर आपके साथ खडे हो जायेगे.लेकिन खबरदार अगर गलती से भी ये नुस्खा आपने मदर मेरी , यीशु या फ़िर हुसैन साहब या फिर मुहम्म्द साहब के परिवार के साथ प्रयोग कर लिया ,तो आपका तो साहब अल्ला ही मालिक होगा,अब जितने लोग लेखन की स्वतंत्रता पर आपके साथ खडे होगे ,आपके विरोध मे होगे.तुरंत ये आपके खिलाफ़ मीडिया को लेकर ढोल पीटने लग जायेगे जी.सरकार भी आपको अन्दर करदेगी,चाहे किसी की हो ,वामपंथ की सबसे पहले करेगी जो कल तक आपके साथ हिन्दुओ को गरिया रही थी ( चाहो तो बेचारी बंगाली लेखिका कांड देखलो)

२) आप कही से भी चित्रकारी सीख ले समझ मे आये या ना आये (बनाये जलेबी और नीचे लिख दे जीवन की उलझन) .अब दो चार नंगी तस्वीरे हो सके तो खुजराहो से प्रेरणा लेकर बनाये (शकल चाहे कैसी बने पर महिलाओ और पुरुषो के अतरंग अंग जरूर दिखाई दे)बस .अब इन पेंटिंग को किसी देवी देवता की बताकर किसी छाप दे,देखियेगा आपको कितनी प्रसिद्धी मिलती है .आपका ब्लोग चैनल पर होगा आपका इण्टरव्यू भी होगा,तथा सारी सरकार आपके साथ होगी ,आपके लिये लेख लिखे जायेगे,आपके कार्य की स्वतंत्रता के लिये अमेरिका तक से एड आ जायेगी जी .लेकिन खबरदार अगर आपने ये हरकत किसी और धर्म (हिन्दू धर्म के अलावा कोई भी) के किसी मिथक के खिलाफ़ की तो आप को यही लोग (जो आपके साथ खडे थे) आपको आपके बनाने वाले के हजूर मे भेज देगे.

३) तीसरा काम आप इतिहास लेखन का भी कर सकते है.इसमे भी आप अपने अन्दर की तमाम गन्दगी आप अपने ब्लोग पर उडेल सकते है,आप हिंदू इतिहास मे से किसी को भी उठाईये,और उसके चरित्र की ऐसी तैसी कर दीजीये ,उसकी बीबी को उसकी बहन बता डालिये अगर कोई महिला चरित्र है तो उसके संबंध उसके पति को छोड कर बाकी सबके साथ बता दीजीये.अगर आपकी किस्मत अच्छी हुई तो आपकी किताब नेहरू यूनिवर्सिटी के इतिहास के पाठ्यक्रम मे शामिल हो जायेगी.लेकिन खबरदार अगर आपने किसी और धर्म के बारे मे सोचा.सम्पूर्ण भारत की जमी्न आपके भागने के लिये छॊटी पड जायेगी.

तो ये तो थी ज्यादा बडी प्रसिद्धी पाने की तरकीबे,लेकिन अगर आप ब्लोग मे भी प्रसिद्धी पाना चाहते है तो उपर वाले कार्यो के साथ आप ब्लोगरो और एग्रीगेटर को भी गरिया कर पा सकते है

आप बात करते है स्वतंत्रता की

तो साहब हमारा तो अब ये सोचना है कि जब आदमी जो गालियां जो भाषा अहाते मे या किसी रंगीले (माफ़ कीजीये ऐसा मेरा सोचना है मुझे इन जगहो का ज्यादा तजुर्बा नही है) बाजार मे प्रयोग करता है वही अपनी स्वतंत्रता और जागरूकता के नाम पर अपने ( ड्राईंगरूम)दिवान खाने,बैठक मे प्रयोग करना चाहता है (जैसे शरीर के तमाम अंगो के नाम क्योकी वह सत्य के नाम पर इनके तमाम पर्यायवाची से सबको रूबरू कराना चाहता है) तो वह मेरे ख्याल से अपने और परिवार के सदस्यो के वो कार्य जैसे नहाना, मल मूत्र त्याग इत्यादी भी अलग कमरे (जैसे स्नान घर या लैट्रीन) मे ना करके ड्राईग रूम या चौराहे पर भी करा सकते है.इससे आपकी स्वतंत्रता की अभिव्यक्ती और लोगो तक पहुच जायेगी ,हो सकता है कोई चैनल वाला ही लाईव प्रसारण भी करवा दे.. एक पंथ दो काज,यानी आप प्रसिद्ध भी और साथ मे दुनिया आपकी सादगी से दो चार भी हो लेगी.
आप अपने बच्चो को भी आगे बढाने के लिये घर पर ककहरे की किताब के साथ इस प्रकार की चित्रातमक पुस्तके पढने के लिये देकर उन्हे सारे पर्यायवाची शब्दो की जानकारी दे सकते है,उन्हे बता सकते है,जब आप इस महान कार्य मे लगेगे तो आने वाले वक्त मे आपको कोई कुछ नही कहेगा ,कोई आपके लेखन पर उंगली नही उठा सकता,सब आपकी तरह सत्य को जानने बोलने वाले सरल हृदय लोग बन जायेगे.आपके बच्चो की इस विषय मे इतनी अधिक जानकारी देख कर हो सकता है कोई न्यूज चैनल वाले सरकार तक बात पहुचा दे और आपके बालक देश मे प्रोढ सेक्स एजूकेशन देने के लिये सरकारी नौकरी प्राप्त करले .

मतलब हर तरफ़ फ़ायदा ही फ़ायदा है,बस आपकी खुले ये दिमाग (ब्रोड माईडेंड) बात हम पिछडे संकुचित दिमाग वाले लोगो के पल्ले नही पडेगी ,तो उससे आपको क्या फ़रक पडना है जी" जिन डुबा तिन पाईया " वाली बात है ना,आप आगे बढे ,हमारा क्या है हमे तो यू ही जिंदगी इसी पिछडे बदबूदार घुटन भरे माहौल मे काटनी है,जहा हम बडो के डर से सिगरेट खुले आम गली मे नही पी सकते घर की तो बात छोडिये , दारू के लिये (घर पर कॊई बडा ना देख ले ) छुप छुप कर प्रोग्राम बनाना पडता है..क्या करे जी हम आपकी तरह के माहौल मे नही पले बढे है और अब कोई कितनी भी कोशिश करले नही सुधर सकते ना..

आप इस कार्य क्रम को और अधिक भी बढा सकते है,आप अपने परिवार को भी इसमे शामिल कर सकते है ,अब जब दुनिया को पता है कि आप शादी शुदा है तो जाहिर है कि आप सेक्स भी करते ही होगे,ये भी दुनिया समझती है. तो फ़िर क्या जरूरत है बच्चो के सोने तक मन की इच्छा को मन मे दबा कर रखने की ,या फ़िर आप दोनो कमरे मे अकेले हो इसकी इंतजार करने की..? जब मर्जी हो तब शुरु हो जाये बच्चो का ज्ञान वर्धन हो जायेगा,और आप अगर कही गलत होगे तो बडो से मार्ग दर्शन भी मिल जायेगा,अगर कही मेहमान भी आये हुये हुये तो आपकी सादगी और सत्यता पर मर मिटेगे ,यानी सोने पे सुहागे जैसी बात हो जायेगी. अगर कभी आपको बाजार घूमते या कही किसी और जगह सेक्स की इच्छा बलवती हो तो तुरंत जाहिर करे मन ना मारे,आखिर आपकी आदत तो "जो मन मे है उसे तुरंत उडेल देने की है" वही शुरु हो जाये ,अरे भाइ विदेशो मे भी इसकी स्वतंत्रता है तो यहा भी आपको होनी ही चाहिये ..? जल्द ही आपकी अपनी सादगी और सत्यता भारत भर फ़ैल जायेगी शायद विदेशो मे भी, बस किसी चैनल वाले की नजर आप पर पडने की देर है,हो सकता है कुछ एन जी ओ वाले भी आपको संपर्क करे..तो देर किस बात की जी तुरंत शुरु हो जाये चाहे तो इंडिया गेट जैसी जगह से अपने इस कार्यक्रम की शुरुआत कर डाले .आप खाली ब्लोगजगत मे ही प्रसिद्धी के पीछे काहे वक्त खराब कर रहे है जी..

अब जिसे ये तरीके पसंद आये वह भी टिपियाये जिसे ना आये वो भी टिपियाये और जो इन तरीकों को ब्लॉगजगत में आजमा रहे हैं वो कोई और तरीका जोड़ना चाहे तो टिपियाके जोड़ दे. आखिर मन में जो है उसे उगलना है हमने भी उगल दिया अब बारी आपकी.
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Wednesday, March 12, 2008

"प्रसिद्द कैसे हो"

लेखक का किसी से कोई राग द्वेश नही है,वह तो सिर्फ़ एक फ़ैलोशिप (जो उसने बडी मुशकिल से जुगाडी है) प्रोग्राम के तहत अपनी पूरी व्यवसायिक इमानदारी से " प्रसिद्ध कैसे हो " पर जो दिखा लिखने के प्रयत्न मे है

प्रसिद्ध होने के जो तरीके हमारी पास श्रंखलाबद्ध है उनमे पहला नंबर है
आपकी अपनी एक चमचा मंडली होनी चाहिये,आखिर रहीम जी ने भी इसी बात को पहचान कर आज से डेढ शताब्दी पहले ही जो कह दिया था
"रहिमन चमचा राखिये,चमचा बिन बरबाद
प्रसिद्धी राजनीती अफ़सरी,चमचे से आबाद"

अर्थात रहीम दास जी कहते है " हे प्राणी चमचा जरूर साथ रख्रे,इसके बिना आपके द्वारा किये गये महान से महान कार्य व्यर्थ है,इसके होने पर आपके द्वारा किये गये तुच्छ से तुच्छ कार्यो को भी महानता की उपाधि मिल सकती है,राजनेता,अफ़सर,और प्रसिद्धी चमचे ही आबाद करते है.
कबिरा संगत चमचे की,ज्यू फ़ागुन की बरसात
मेह पडे शीतल लगे,भूले लू की बात

इसी मुद्दे पर कबीर जी ने भी प्रकाश डालते हुये लिखा था "हे प्राणी चमचे की संगत बिलकुल ऐसी है जिस प्रकार जैसे जेठ माह की झुलसाती धूप के बाद फ़ागुन की बरसात शरीर पर पड कर शीतलता देती है,और मनुष्य लू के मौसम को भूल जाता है,ठीक उसी प्रकार मनुष्य अपने द्वारा अकेले मे किये गई अथक परिश्रम को चमचे के साथ किये गये छोटे से परिश्रम के बडे फ़ल की शीतलता मे खॊ जाता है"
नही पराग नही मधुर मधु,नही विकास इही काल
अली चमचौ नै भूल गयो,आगे कौन हवाल

महान हिंदी कवि और श्रंगार काल के प्रमुख ने भी चमचो की दीन हीन दशा पर द्रवित होते हूये लिख डाला "ना पराग और ना शहद मधुर लग रहा है,विकास कार्यक्रमो का तो कुछ पता ही नही है,जब अली अर्थात सम्राट ही चमचो को भूल गया है तो आगे किससे उम्मीद रखे"
प्रसिद्धी प्रसिद्धी सब कॊइ करै,प्रसिद्ध न होवे कोई
जो जन जानै चमचा माहत्य,प्रसिद्ध कैसे ना होई

रसखान जी ने भी इसी प्रकरण पर रोशनी डालते हुये लिखा था "सारा जंहा प्रसिद्ध होने के चक्कर मे लगा है ,पर वही प्रसिद्ध हो सकता है जो चमचो की महत्ता जानता हॊ"

"बिन गुन जोबन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि।
सुद्ध कामना के सहित,चमचा सकल रसखानि॥ "

आपको अच्छा जो शु्द्ध ह्रदय से आपकी भलाई चाहने वाला चमचा ना मिले तो,जिस प्रकार बिना गुण के योवन,रूप और धन बरबाद हो जाते है,(क्योकी तब आप बिना अपने स्वार्थ और हित को देखे निर्णय ले लेते है) आप उसी प्रकार बरबाद हो जायेगे

प्रेम अगम अनुपम अमित, सागर सरिस बखान।
जो चमचा एहि ढिग बहुरि, जात नाहिं रसखान॥

यदि आप अपने चमचे को अनुपम समझ कर उसे अपने अमित(असीमित)प्रेम दर्शा कर उसके सागर जैसे निर्मल स्वभाव का बखान यहा वहा करते रहना चाहिये, जिस चमचे को इस प्रकार रखा जाता है वो कभी आपको छोडकर नही जाता..

"इस लेख माला की अगली कडी मे हम आपको "ब्लोगजगत और चमचो का प्रयोग "सोदाहरण समझाने की कोशिश करेगे"

चिठ्ठा इतिहास