कल रात मेरे सपने मे महान योद्धा बडॆ भैया सुयोधन ने दर्शन दिये,वे मेरे द्वारा उनकी डायरी इस तरह सार्वजनिक करने का अधिकार शिवकुमार जी को सिर्फ़ एडसेंस के पैसे मे देने पर बडे व्यथित थे. उन्होने कहा अर्जुन तुम आज भी वैसे ही हो ! कतई नही बदले,तब भी मेरे से पांच गाव मागने चले आये थे, जबकी मै पचास गांव देने के लिये राजी था .पर तुम्हारे दूत कॄष्ण की चालो मे आकर मुझे जीवन और साम्राज्य के साथ इतिहास मे भी सुयोधन से दुर्योधन बन कर अपने नाम तक से वंचित होना पडा.ये अलग बात है कि तुम जीते पर अपने आत्मजॊ कॊ खॊकर ही ना..?
तुम कितने सीधे हो तब तुमने अपने सारे अधिकार उस कृष्ण दे दिये थे और आज भी शिवकुमार जी को दे डाले.आज भी तुम कहा हो और मै कहा..?तुम्हे आज भी किसी की मदद लेने से परहेज है ,अगर तुम मेरे से संसद मे आकर मिल लेते तो मै तुम्हे भी कोई अच्छा ठेका दिलवा देता और इस पांडूलिपी को तो किसी अच्छे प्रकाशन से छपवाता ताकी तुम्हे भी करोडो नही तो लाखॊ डालर तो मिल ही जाते,मेरे लघु भ्राता अब मुझे तुमसे कोई द्वेश नही है अगर होता तो यकीनन मै तुम्हे तब ये पांडुलिपि कतई नही देता.क्योकी मै जानता हू तब तुम उस कॄष्ण के मायाजाल मे फ़से थे.
अब यहा भी देखो,तुमसे जरा से प्यार से बतिया कर शिवकुमार जी ने इस पांडूलिपी के सारे अधिकार हथिया लिये और वोह इस पर फ़िल्म बनाने के अधिकार के लिये संजय लीला भंसाली तथा आमीर खान से मोल भाव करने मे जुटे है,तब कॄष्ण ने अपने जनसंख्या कम करो के अभियान मे तुम्हे मोहरा बनाया था.आज तुम शिव के झासे मे आकर तगडी कमाई से हाथ धो बैठे,तुम्हे तो हमेशा से कॊइ भी मछली की आख दिखा कर अपना काम करा लेता है,किसीने जरासी डींग मारी वाह अरूण क्या कंसन्ट्रेशन है तुम्हारा और तुम्हारे निशाने का तो जवाब ही नही ,बस तुमने ना कुछ देखना है ना सोचना समझना कि अगला तुम्हे धनिये के झाड पर चढाकर खुद नारियल पानी और मलाई खा रहा है.तुम तो लग गये मछली की आख देखने के चक्कर मे ,तुमने कभी ध्यान दिया की उस मछली का शोरबा किसने पिया या उसके पकोडे बनाकर कौन खा गया. इन बातो से तुमने मतलब नही रखा. मेरे प्रिय अनुज तब भी तुम्ही जीत कर लाये थे ना द्रोपदी को,पर क्या हुआ था .? वहा भी तुम अपने सीधे स्वभाव के कारण बोल नही सके और बाकी भाईयो ने मिलती मलाई मे मुंह मारते हुये कब तुम्हारे बारे मे सोचा.?
अब आलोक जी को देखो वोह तुम्हे हर निबंध या किसी भी लेखन प्रतियोगिता मे भाग लेने के लिये जरा सा प्रोत्साहित क्या कर देते है, प्रथम तुम आते हो ,लेख छापने के अधिकार उन्हे दे देते हो ? इसीलिये मै तुम्हे हमेशा राजकाज से दूर रखना चाहता था.राजकाज तुम्हारे बस की बात नही है .इसीलिये तुम आज भी एक मजदूर की तरह रोज कमाकर खा रहे हो और मै आज भी शासन कर रहा हू 
अभी पिछले दिनो तुमने जो आईडिया ज्ञान जी को रेल की पटरी पर इंजन की जगह ट्रक को चला्ने का दिया था,तुम्हे तो पता भी नही मेरे अनुज ,ज्ञान जी ने उस को कोकंण रेलवे मे प्रयोग कर पदोन्नति भी पाली और तुम्हे मीठा तक भी खिलाने लायक नही समझा मेरे भाई. अब भी वक्त है सुधर जाओ,जमाने की हवा देखो उसके साथ चलने की कोशिश करो , तुम्हारा नही तो कम से कम इन बालको का जीवन तो सुधर जायेगा .अगर तुम आने वाले दिनो मे अपने आप को बदल लो, निशाना साधो ,पर हमेशा ध्यान रखो ध्येय बडा हो.अपने लिये हो अपनो के लिये हो.देखो अनुज तुम्हारे जरा से मार्ग परिवर्तन से हम दोनो मिल कर इस देश के कर्णधार बन सकते है, राजनीति शकुनी मामा की होगी चाल मेरी होगी और निशाना भी मै ही बताऊंगा बस तुम्हे सिर्फ़ और सिर्फ़ निशाना को बेधना है. आने वाला वक्त हमारा होगा ,फ़िल्म चाहे कोई बनाये ,अधिकार चाहे कोई बेचे पैसे हम वसूल लेगे मेरे प्रिय अनुज .
Saturday, March 8, 2008
"दुर्योधन/सुयोधन का दर्द"
Thursday, March 6, 2008
"एक लम्बी कविता"
"
जीवन को हर पल जीते रहना
कहना सरल है मुश्किल है जीना
चाहो चांद को खो जाती है चादंनी भी
फ़िर आने का गम सताता है
वरना छोड दे जिन्दगी भी "
"यू तो जीने को जी रहा हू मै
अमृत मिले या मिले गरल
पी रहा हू मै
पर जिंदगी उदास है..
जीवन सफर है ,मंजिल मौत
मुझे भी जीना अपना वनवास है"
"एक दिन
मेरी जिन्दगी ने मुझ से यू कहा "
कही भी कहो कुछ भी कहो
पर यू न कहॊ
कि जिन्दगी उदास है
ढूढो तो खुशिया बहुत
वरना वनवास है
"मै तो चाहती हूं लगाने
तेरी जीवन मे खुशियो भरे शामियाने
पर ढेरो गम सीने मे छूपाये
तुझे तो पसन्द ही है विराने "
"मै तो चाहती हूं सुनाना
तुझे खुशियो भरी रुबाईया
पर क्या करु तुझे तो
पसन्द ही है मातमी शह्ननाईया 
"जब जब मैने चाहा
तू छुये उचाँईया
तूने हिम्मत तोड ली
ढूढ ली गहराईया
"जब भी साहस की बात हुई
जब तूने किस्मत को मान दिया
हम पहुच चुके थे मंजिल पर्
पर हार का दामन थाम लिया "
"मै रोई बिलबिलाई
मन मसोस कर रह गई
कुछ कर गुजरने की चाहत
आसूओ मे बह गई"
"किस् से करु गिला शिकवा जब
तूने ही दम तोड दिया
मै तो लडती आखिर तक
पर साथ जो तूने छोड दिया "
"हर निर्णय मे संग हू तेरे
हर हाल मे साथ निभाउगी
परिहास उडाती नजरो मे
पर मै कैसे जी पाउगी"
"अभी भी गुजरा वक्त नही
क्या तुझमे सामर्थ्य नही
क्यो दीन हीन बन रोता है
क्यो मानव जनम को खोता है "
"ये जीवन है संघर्ष तेरा
तू ढूढ यहा विश्राम नही
राह बना तू अपनी खुद
बनजा मेरा अभिमान यही "
"तू टूट गया हो भले जग से
मेरा तो भरोसा है तुझ मे
उठ जाग,खडा हो झाक जरा
अपने सोये अन्तर्मन मे "
"जब मै साथ चलू तेरे
तू नही अकेला है जग मे
विप्लव मे बच जाते है
जब द्र्ढता हो अपने मन मे"
"उठाओ कुदाल हाथो मे
बना लो रास्ता अपना
कदमो तले होगी मन्जिल
होगा सच हर-इक सपना "
"ये बस इक शपथ लेलो
न रोयेगे कभी अब हम
देखे तो जरा हम भी
खुदा देता है कितने गम"
"देखे तो जमाने तू
देता है कितने नासूर
गिरेगे पर उठेगे फिर
पहुचेगे मंजिल पर जरुर
तू ढूढ बहाने गिराने के
मुझे है फ़तेह का सरुर"
Monday, March 3, 2008
"रसिक बलमा" हायरे
एक तरफ़ तो बलमा लगता है कि अगर रसिक ना हो तो वो बलमा होने काबिल ही नही है,यानी जो रसिक हो वही बलमा की उपाधी धारण कर सकता है,
द्सरी और हम तो यही देखते आ रहे है कि जो सज्जन बालिकाओ के विद्यालय के आगे चौपाल लगाकर रसिक प्रशिक्षण मे पारंगत होने बैठे थे,उनकी धुनाई जूत माला जलूस के बाद यही बताया जाता है कि रसिक लाल बन रहा था,यानी अगर पूरा रसिक बन जाये तो बलमा से अलंकॄत,उससे पहले फ़स जाये तो पूरे शहर का मनोरंजन करने के साथ शहर की कानून व्यवस्था संभालने वाली प्रणाली के पुलिस नामधारी कार्यकर्ताओ के चायपानी का प्रबंध कर्ता..?बहुत ज्यादती है जी
एक तरफ़ तो हमारी नायिकाये सदियो से रसिक बलमाओ के लिये गाती रही है ना..रसिक बलमाआ,हाय रे,दिल क्यू लगाया तुझसे रोग लगाया, मतलब मेरी समझ मे नही आता,अब किसने जाकर उससे कहा की रसिक से दिल लगाओ,और रोग लगाओ,खांमखा अब दवाईयो मे पैसे खर्च करो.और अगर प्रशिक्षु से लगाओ तो कौन सी बुराई है..? वहा शायद दवाईयो के पैसे भी ना खर्च हो अगला सीखने के चक्कर मे दिन रात आपके सामने रहेगा,तो रोग भी नही पकडेगा..?
और अगर वो रसिक नही है तो दिल भी नही लगाना,ये कहा का कानून है ..?
यानी अगर बंदा रसिक नही है तो उसकी तो गई भैस पानी मे,बेचारे को जैसे तैसे करके घर वालो ने जिस खूटे से बाध दिया वही आटा दाल नून तेल के जुगाड मे लगा रहे ,और इसी गम को सीने से लगाये दुनिया से फ़ना हो जाये,की हाय हम भी काश रसिक होते ,तो अपने यारो दोस्तो को हम भी कोई अपनी रसिकता का किस्सा सुना पाते,हम भी बता पाते की हमे भी किसी रीता,गीता,कविता की याद रोड जाम देख कर आई..सच मानिये दिल से इक हाय निकलती है ,काश मै एक बार वापस उस युग मे वापस चल जाऊ,अबकी चाहे पुलिस पकडे या कालेज से निकाला जाऊ,चाहे घर पे खबर जाये बापू वाकई जूत पतरम शीश मध्यम कर डाले, पर एक बार तो मै भी अपनी रसिक बनने की इच्छा पूरी कर ही लूगा,चाहे कालेज की सारी लडकियो को ही छेडना पडे,क्या पता कोई सी बलमा की उपाधी दे ही डाले,
अब आप खुद ही देखिये इस रसिक बलमा गाने वाली कन्या को किसी तिवारी से धोखा मिला है."वो जब याद आये तिवारी,सूरत वो प्यारी प्यारी,नेहा लगाकर हारी" मतलब उस तिवारी की जो रसिक है नायिका को याद आ रही है,अब उसे उसकी सूरत भी प्यारी लग रही है,इसी गम मे वो नेहा नाम की किसी वस्तू को भी बार बार लगा कर हार गई है,तो ये समझ मे नही आता कि इस तिवारी नाम के रसिक महोदय मे वो कौन सी खूबी है जो उन रसिको मे नही थी जो बेचारे कन्या विद्यालय के सामने अपकी रसिकता दिखाने के चक्कर मे पिट गये.
वैसे ऐसे दो चार रसिको को कम से कम एक ब्लोग ही बनाकर प्रशिक्षु रसिको के लिये ज्ञान बाटने का तो काम अवश्य ही कर लेना चाहिये.(समीर लाल जी से विषेश अनुग्रह.:)),टिप्पणियो से ज्यादा दुआये मिलेगी,ब्लोगिग की दुनिया से ढेरो लोग जुड जायेगे.(सारे कन्या विद्यालयो के सामने संजाल ढाबे खुल जायेगे ,देश मे रोजगार भी बढेगा)
एक तरफ़ तो महिलाये रसिकता दिखाने वाले को बलमा स्वीकार कर लेती है,दूसरी और वो इस कार्य मे संलग्न प्रशिक्षशु रसिको को मारने पीटने की धमकी देती दिखाई देती है.(यहा मै एतद द्वारा यह घोषणा करना उचित समझता हू कृपया नोट करे,इस बात का संदर्भ कही से भी कतई चोखेर बाली या उन जैसे लेखन विद्या पारंगतो की तरफ़ नही है जी)अब अगर प्रशिक्षण पूरा नही होगा तो कल बलमा बनने के लिये रसिक कहा से आयेगे,
ऐसा भी नही है की हमने कोशिश ना की हो,की थी .नई नई पडोसन पिक्चर देखी थी और साथ पढने वाले एक पूर्ण प्रशिक्षित रसिक जी को भी दिखाई थी,उनसे अपने लिये किशोर कुमार जी की तरह का बलिदान भी मांगा था .पर हाय री किस्मत ,जिस बिंदू के चक्कर मे अपनी सारी जेब खर्ची गुरु दक्षिणा मे उडा दी,हमे कार्ड बाटने का काम देकर वही बिंदू को ले उडा,और हम उनकी शादी मे मंडप से लेकर पंडित तक का काम संभालते हुये मुकेश जी का "कभी इश्क मे रकीबो को कासिद बनाते नही,खता होगई मुझसे कासिद मेरे तेरे हाथ पैगाम क्यू दे दिया"गाते रहे
पर अब वक्त निकल चुका है,समय के थपेडॊ ने चादंनी बालो के साथ चांद भी नुमाया करदी है,अब अगर हम चादनी की चाहत भी करेगे तो किसी के कतल से ज्यादा बडे गुनहगार घोषित होगे,(मुंह मे दात नही पेट मे आत नही चला है फ़टी पतंग लेकर पेंच लडाने)ऐसे मे सिवाय दूसरो के किस्से सुन कर चुपचाप दिल ही दिल मे आहे भरने के अलावा और कर भी क्या सकते है ,या सुना है कनाडा मे इस उम्र मे भी कोई रोक नही है.अब समीर जी ले चले तो वही कोशिश करके देख लेगे,शायद वही कोई बलमा बनाले..:)
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