Saturday, February 16, 2008

"प्रसिद्ध कैसे हो एक खोज"


कोई माने या ना माने हम तो मानते है की अब हम लेखको की जमात मे शामिल हो चुके है. बस अब सवाल ये है प्रसिद्धी कैसे पाई जाये..?

ये एक बडा सवाल है,हालाकी जितने भी लोग ब्लोगिंग करते है,भले ही वो डींग हाके की हम स्वांत सुखाय लिखते है,पर अंदर ही अंदर उनके दिल मे भी प्रसिद्ध होने की अभीलाषा छुपी हुई है,वरना ब्लोगजगत मे प्रायोजित पारितोषिक वितरण मे (पहले से ही मालूम होने के बाद भी) लोग इन पर हल्ला ना काटते कि हमे नही मिला..?

और इन्ही हल्ला काटु लोगो के कृत्यो से जिन्होने अपने लिये सम्मान का जुगाड कराया था,उनकी सारी मेहनतो पर पानी फ़िर गया जी,धेले की वकत करदी इतने जुगाड से जुगाडे गये सम्मान की..दूसरे को क्या कहे हमने खुद अपने लिये एक शानदार शाल उढाऊ सम्मान समारोह आयोजित कराया था ,पर ऐसे दिल जलो के हल्लो से हमने अपने शाल को किसी दूसरे से ओढने के बजाये चुपचाप घर लाकर खुद ही ओढ लिया,(शाल हमारा जुगाड हमारा,सारा खर्चा हमारा,और हल्ला ये काटे कि इन्हे क्यो नही दिया गया) अब हम सुबह शाम ऐसे दिलजलो को पानॊ पी पीकर कोसते हुये शाल ओढकर पडोसियो को दिखालेते है कि हमे टुम्बकटू मे आयोजित सम्मान समारोह मे मिला था..

यहा हर ब्लोगर अपने को बडा कहलवाने के लिये अपने साथ चार चंपुओ की फ़ोज के जुगाड मे लगा रहता है,जिनके पास जुगाड है(चंपुओ का) वो इस बात को सिरे से नकारते रहते है..जिनके पास नही है वो इस बात को उछाल उछाल कर "हम इस तरह की घटिया हरकतो मे शामिल नही है जी" ,का ढोल पीटते रहते है जैसे हम..)
लेकिन मामला वही है. प्रसिद्धी का ! पता सबको है रास्ता शमशान का ,जानते सब है की जाना वही है.पर सब वक्त के कालपात्र मे अपने चरण चिन्ह छोड जाना चाहते है. हर एक की अभिलाषा अपने नाम को कही ना कही मुफ़्त मे उकेर देने की है..जैसे प्रेमी जोडे पुरानी हवेलियो पर या पेडो के तनो पर कुरेद देते है..पता है ना कि ना सरकार पुताई करायेगी ना ये मिटेगे..:) (वैसे दिल तो हमारा भी है कि कम से कम संसद भवन या राष्ट्रपति भवन की दिवारो पर इस देश के स्त्यानाशक के रूप मे बाकी लोगो के साथ हमारे स्वर्णिम योगदान के लिये हमारा नाम भी उकेरा जाये
वैसे इस खोज शब्द मे ही हमे कोई खास दिलचस्पी नही है,लेकिन जैसे ही हमे लगा की खोज शब्द भी प्रसिद्ध होने की सीढी बन सकता है .हमने तुरंत इसे अपना लिया. इसी से हमे पता लगता है किसने किसकॊ खॊजा था..पर यहा भी एक सवाल ख्डा हो रहा है..बचपन मे हमने पढा था भारत को वास्कोडिगामा ने खोजा..तो उससे पहले भारत कहा था..हम कहा थे हम उसे खॊज मे मिले या फ़िर उसके खोजने के बाद भारत आये..?

लेकिन बाद मे पता चला एक भारत नेहरू जी ने भी खोजा था ,उन्होने एक भी किताब लिख डाली थी "भारत एक खोज" खोजने पर वो तो मिल गई,लेकिन सवाल अनुत्तरित रहा.! अब वास्कोडिगामा ने भी कॊई किताब लिखी थी या नही ये भी खोज का विषय है..यहा एक सवाल और आ गया कि नेहरू जी का भारत उनके खोजने से पहले था तो उन्होने क्या खोजा क्या आजकल के नेताओ की तरह एक ही पुल का उदघाटन दो लोगो वास्कोडीगामा और नेहरू ने कर डाला..?
खैर हमे क्या ,हमे तो इसीबात पर गर्व है कि हमे खोजने के लिये दो बडे नामो ने मेहनत की ,यानी हम भारतीयो मे कुछ तो है जिसे खोजने भर से ही दो लोग इतिहास पुरुष हो गये..इन्ही घटनाओ से प्रेरित होकर हमने भी दिवार मे सर मारने जैसी हरकत करने की ठानी ली है यानी अब हम खोज करके ही मानेगे..

वैसे हम एक महान वैज्ञानिक को भी जानते है जिन्होने अपना सारा जीवन खोज को ही समर्पित कर दिया था, जीवन के अंतिम वर्षो मे उनकी छपी उनकी शोध प्रबंध को पढकर ही हम जान पाये की ,उनकी खोज हम सब के लिये कितनी उपयोगी थी..वह थी" कांच से निर्मित किसी भी ओबजेक्ट को अगर दो फ़ुट या उससे अधिक उचाई से गिराया जाये तो वह टूट जाती है" आशा है आप भी इस खोज से लाभांवित होगे ,पर उम्मीद रखिये हमारी खॊज इससे उन्नीस नही होगी..अगले अंक मे जारी..

Friday, February 15, 2008

चीटियो का ओलंपिक और प्रमोद जी का सिर धुनना

पिछले दिनो हमे प्रमोद जी (अरे वही अदरक, अरे नही नही अजदक वाले जो आजकल कभी बहसियो को आंमत्रित करते है ,कभी सिर (अपना)धुनने की धमकी देते दिखाई पडते है)के साथ विदेश जाने का मौका मिला. विदेश कहा..? अरे भाइ आप सवाल बहुत करते है चीन और कहा ,वही पर अजदक जी चीनीयो को घूरने चले गये और हमसे पीछा छुडाने के चक्कर मे हमे स्टेडियम मे धकेल गये थे..यही पर हमने चीटियो का ओलंपिक देखा उसकी विडिओ रिकार्डिंग तो हम नही कर पाये पर कुछ फ़ोटो मोबाईल कैमरे से ही खीच लाये थे देखिये..
ये पहला वर्डकप मुकाबला है जापानी और ब्राजील की चीटियो के बीच..




ध्यान दे ये पीले सिर वाली चीटी जापानी मुनेका औरी प्रजाती की चीटी है जो ७ से १० मिलीमीटर की होती है

ब्राजीलियन चीटी थी कोशिकामो प्रजाती की ,स्टेडियम के साईज को छोडिये मैदान का साईज था २० सेंटीमीटर लंबा और ३० सेंटी मीटर चौडा

बाल थी एक सेंटी मीटर की..


मैच पूरे जोरो पर था ,चीटिया आपस मे भिडी जा रही थी पर तभी कुछ महिला संगठनो के एतराज के वाद मैच रोक दिया गया..

हमे तो यही लगा की अच्छॆ खासे मैच के उपर पानी फ़िर गया...

ये चीनी लोग बी पानी पीने की जगह कैसे कैसे स्टेच्यू लगा देते है छी छी..

प्रमोद जी चीन मे हमे हमारा मैच आधा अधूरा छूट जाने पर अगूठा दिखाये हुये..


प्रमोद जी चीनियो से घुडसवारी सीखते हुये..(यही वो काम थे जिन को याद कर (की आपलोगो को कैसे बताये) वो आजकल सिर धुनने की कोशिश मे लगे है)कॄपया अब ऐसा ना करे ,आपकी व्यथा हमने सब को बतादी है.


कृपया हम पर गुस्सा ना निकाले,बस उंगली दिखादे जी हम डर जायेगे..

Thursday, February 14, 2008

बसंत तब और अब

दिन बडे होने लगे है,सूरज देवता तो अब गायब होना ही भूल चुके है पर फ़िर भी धूप ज्यादा गुनगुनी हो गई है.सरदी जाने के संकेत देने लगी है . बसंत यानी मदनोत्सव आ गया है,लेकिन अब कहा का बसंत कैसा बसंत,अब कहा कोई देखने वाला रह गया है सरसो के पीले फ़ूल की छटा.अब कहा कौन आम पर आता बोर की भीनी भीनी खुशबू से सुवासित होना चाहता है. बसंती हवा अभी भी चलती है कोयल अभी भी कूकती है ,पर अब वो कान कहा..बसंती बयार को महसूस करने वाले वो दिल अब कहा..? ( इसी के विरोध स्वरूप आज कोई फ़ोटो नही)

अब आंखे तरसती है बसंत पंचमी पर आसमान मे पतंगो को देखने के लिये.पर कंम्बख्त चैनल वाले भी भूल चुके है तो और किसे याद रहेगा. सरसवती देवी की पूजा होती थी .."लडकिया प्रार्थना करती थी वर दे वीणा वादिनी वर दे" हम भी उनके समर्थन मे कहते थे "हे देवी इन्हे जल्दी से वर दे दे" इनकी शादी करादे..:) सीधी सी बात है वर तो तभी मिलेगा ना..:)

कभी हम गुनगुनी धूप मे बैठ कर पीले रंग की गरमागर्म ताहिरी खाते थे ..और छत पर दिन भर पतंग उडाने तथा डाट खाने मे लगे रहते थे.. अब वो कवि भी नही.. ना ही रही वो विरहने जो कहती थी.."बोली यो विरहिन मन को मसोस कर काहे को बसंत बस अंत अब आयो है"

लेकिन अब करेगा भी कौन बसंत की बात .ना पहले जैसी सरदी रही ,और उस पर भी लोगो ने सरदी गरमी बरसात से बचने के उपाय कर लिये है इसी लिये सरदी के बाद बसंत का आना सुखद और शहरियो के लिये दिल खुश करने वाला नही रहा..

रही बात गाव वालो की.. उसे तो सरसौ को पाला मार गया पानी का जुगाड नही हो रहा,बिजली आती नही से ही फ़ुरसत कहा है..जब हर जगह किसान आत्मह्त्या करने के जुगाड मे लगे हो तो कौन देखेगा बसंत की बयार को ..?

वो दिन हवा हुये जब सोलह श्रंगार से सजी धजी स्त्रीया अपने पदाघात से अशोक के फ़ूल खिलाती थी,अब तो माल की स्वचालित सीढीयो पर अपने १००% स्वामित्व वाले सेवक को ठेलती दिखाई देती है..

कभी बनाया होगा अकबर ने मीना बजार बसंतोत्सव के लिये.. कवियो ने लिख डाली होगी रचनाये...पर अब तो उसकी

जगह कही नही है

अब तो वेलेंटाईन का जमाना है जी माल मे जाईये फ़ूल खरीदिये चाकलेट खरीदिये और प्रेमिका को मोटरसाईकल पर बैठा कर फ़ुर्र हो जाईये. ढेर सारे होटलो ने आज वेलेंटाईन मनाने के लिये प्रायोजन किया है ..

"तू नही और सही

और नही और सही

जहा मे सितारे और भी है

तू ना पटी ना सही

किसी और को पटाने कॊ

मेरे पास गिफ़्ट और भी है"

इस वक्त मेरे पास मेरे एक मित्र की इस बारे मे एक कविता भी है तो वह भी पेशे खिदमत है..पसंद ना आये तो दाद अवश्य दीजीयेगा ताकी दुबारा ना पेश करू...:)
एक महिला की विरह वेदना..:) कवि सम्मेलन मे कविओ की तरह सस्वर पाठ कर देखियेगा अवश्य मजा आयेगा..:)

कैसे काटू दिन विरह के बालेपन मे

कैसी आई है विरह मेरे जीवन मे

अब तो बीता जाये सावन

आ जा ओ मेरे अहिरावण

सब के खसम फ़िरे है गैल

अब तो आजा सरकारी बैल

तू तो परदेश करता ऐश

अब मौका मै करूंगी कैश

इस बंगले मे पेड घनेरे

तू मरजा तो और भतेरे

कैसे काटू दिन विरह के बालेपन मे

कैसी आई है विरह मेरे जीवन मे



तेरे साथ तो होगी डाईन

मै भी ढूढू वाइलेन्टाईन

खत कुछ लिखना साझ सवेरा

कब कू करू कनागत तेरा

दुख से फ़टी जाय है छाती

आज ओ बिना सूंड के हाथी

कैसे काटू दिन विरह के बालेपन मे

कैसी आई है विरह मेरे जीवन मे

Sunday, February 10, 2008

कुछ यू ही

अपन झुक नही सकते गाडी ठीक करानी है तो सीधी करो


आई टी प्रोफ़ेशनल..
जीना यहा मरना यहा इसके सिवा जाना कहा..
क्या करे काम ही इतना ज्यादा है..





होट डोग ..


पानी की किल्लत..हम मेहनत कश है..



भज्जी ना पहचाने तो हमारी क्या गलती..



पेडो से दोस्ती बढाये

उन्हे बचाये वो आपको बचायेगे


अपनी अपनी वेलेंटाईन..क्या दोस्ती है..


बस इतना ध्यान रखे वेलेंटाईन नाराज ना हो वरना...
संगणक(कमप्यूटर) को समझने की सीधी सी कोशिश



चाईल्ड बियर (चिल्ड नही/ बच्चो की ) की सरकारी दुकान

चिठ्ठा इतिहास