Monday, February 4, 2008

पुरानी यादे २


मै शायद बचपन से छोटे छोटे कस्बो मे रहने के कारण कभी पैसे का मूल्य नही समझ पाया उस वक्त पैसे की शायद मुल्य शायद था भी नही इतना ,इज्जत दूसरे कारणॊ से भी मिल जाती थी ,आजकी तरह नही जो सिर्फ़ मोटर्साईकल और माल मे जाने लायक माल होने पर ही मिलती है..:)
जहा पिताजी की काफ़ी इज्जत होती थी तो कभी पता भी नही चला,कभी कही दोस्तो के साथ चले गये तो हमारे घर लौट्ने से पहले घर पर पूरी रिपोर्ट होती थी कि हम कहा कहा देखे गये ,कभी कभी तो लगता था कि यहा से भाग जाये जहा हर कोने मे हमारे अभिभावक मौजूद है ..अगर कही काम से भी भेजे जाते तो भी रास्ते मे १० लोग बेमतलब ही "कहा जात हो लल्ला,और सुनो अगर दुबारा ई छोरे के संग देखा तो हमे पापा से बोलनो परिहै समझ गये ना"पूछ कम बता ज्यादा दिया करते कि लल्ला हम भी तुम्हारे बडे है और हमारे उपर कडी निगाह रखते कही हम बिगड ना जाये..
मै और मुन्ना मेरा पडोसी दोनो एक क्लास मे थे घर के बाहर वाले बरामदे के सामने १२ फ़ुट चौडी रोड पार करते ही सामने स्कूल की दीवार चार,साढे चार फ़ुट ऊची दिवार थी जो कालेज के अंदर से केवल डेढ फ़ुट ऊची थी ..१५ फ़ुट का छॊटा सा मैदान पार करते ही हमारी कक्षा आ जाती थी जो मैदान से लगभग ढाई फ़ुट ऊची थी .मतलब कुल मिला कर हमारी छत और कक्षा का धरातल एक ही था,यानी अन्दर से उचाई बस डेढ फ़िट उस के ठीक आगे हमारी क्लास ,इतनी गलत की जरा सा इधर उधर झाका छ्त पर कपडे सुखाती मुन्ना की या मेरी मा ने देखा और हो गया काम ,वैसे मेरे माता पिता जहा तक मेरा ख्याल है मुझे इतना कंट्रोल नही करना चाहते थे..पर वक्त ही बुरा हो तो कोई कर भी क्या सकता है ,स्कूल मे शिक्षको से लेकर कस्बे के सारे गणमान्य व्यक्तियो को लगता था पिताजी के साथ मेलजोल की पूरी जिम्मेदारी उन्होने मेरी देख रेख कर ही पूरी करनी थी..कभी कक्षा मे किसी के साथ मार-पिटाइ की इच्छा हो या गाली गलौच की,हमेशा मेरे या मुन्ना मे से एक घर की तरफ़ के दरवाजे पर खडा होकर दूसरे को बताता रहता था मार मार ले कोई नही है..और जब कोई छत पर होता तो प्रतिद्वंधी के लिये अच्छा मौका होता था.. तब हमे सिर्फ़ सुनने और घूसे खाने के अलावा कोई चारा नही होता..वरना घर पर पूरा हिसाब लिये जाने का डर होता..हालाकी ऐसा कभी हुआ नही ..पर शायद हम दोनो ही इस मामले मे डरपोक थे..

मुन्ना का शौक बस एक ही था जैसे ही शिक्षक कक्षा से बाहर मुन्ना दिवार फ़ांद घर मे,जैसे ही अगले घंटे के शिक्षक आते दिखाइ देते ..कोई ना कोई दिवार के पास आकर आवाज लगाता मेढक( या जो भी उनको विद्यार्थियो द्वारा दिया नाम होता) आ रहा है वो दिवार फ़ादता और सीधे क्लास मे,

सारी गर्मी सुबह चार बजे जगते घूमने जाते वो पहले रास्ते मे पडने वाली मस्जिद मे अजान देता फ़िर नमाज अता करता मै तब तक गली मे चार पांच चक्कर काट चुका होता फ़िर दोनो बारादरी तक जाते दौडते हुये वहा और दोस्त भी मिलते फ़िर किसी के आमो के बाग का नम्बर लगा ही देते या फ़िर पास वाली नहर मे नहाने चले जाते कई बार सुबह सुबह पास वाले तालाब पर गुल्ले चाचा सोते दिख जाते तो उनकी कचरी फ़्रूट ककडी या कमल गट्टे चुराने का मजा ही अलग था वो भाई दौडाता बहुत था और ये कार्य दो तीन आम या ककडी के लिये ये काम नही था ये था उन लोगो को तंग करने के लिये जो बगल से गुजरते ही हल्ला काट देते थे अरे कौन है आवत है जरा ठहरो…? बडा मजा आता था सच मे,मुन्ना को महारत हासिल थी इस काम मे कोई सोता दिख जाय दो तीन पत्थर पेड पर साथ मे हल्ला अरे बाबा सो रहे हो उहा देखो ये पोटली भरे जाय रहा है और फ़िर भागो,

बाबा भागते भागते मन भर गालियो देते हुये थोडी दूर पीछा करते और फ़िर वापस लौट जाते..कभी कभाक हम लोग पकड मे आ जाते तो कुछ भी ना निकलने पर और भी ज्यादा जोर से गरियाते हुये "खामखा मे नींद खराब की "कहते हुये वापस चले जाते...

तब की सर्दिया लगता है जन्नत थी..बारिशो भरी सर्दिया,जब घर के लोग कहने लगते थे इस बार तो चालिस दिन का चिल्ला पडेगा (यानी अब सूरज चालिस दिन बाद दिखाई देगा) धुंध भरे रास्ते ,जब मीटर भर ना दिखाई दे ,तब हम स्कूल जरूर जाते थे,(भाई अगर घर मे रुके तो पढना तो पडेगा ना) .स्कूल मे जाकर टूटी फ़ूटी कुर्सी मेजे तलाशना और हाथ तापना ,बडा मजा आता था..मास्साब या तो आते नही थे..या फ़िर स्टाफ़ रूम मे चाय पीटे हुये अभी आता हू कहते हुये पैर मलते रहते थे..

छूट्टियो वाले दिन अगर धूप निकली हो तो छत पर बैठ कर गरम गरम देसी घी से भरी ताहिरी ( मटर गोभी का पुलाव)खाने का मजा अब कहा..

उन सर्दियो मे एक बात अलग थी तब हमारे लिये एक शाही भॊज होता था..हमारे घर मे माताजी शुद्ध शाकाहारी जो घर मे प्याज भी ना आने दे..और पिताजी अंडो के शौकीन..तो इस कार्य के लिये घर से माताजी ने एक स्टोव एक फ़्राईंग पैन,तीन चार प्लेट ,कटोरी और चम्मचे दी हुई थी..जिन का घर मे प्रवेश निषेध था ..जिस दिन सूरज ना निकले और दिन मंगल शनि तथा बृहस्पत ना हो पिताजी दोपहर से ही आज बहुत सरदी है बच्चो आमलेट खाओगे या एग करी, और हमारे ना कहने का मतलब ही नही होता था.. बस अब पिताजी माताजी से देखो कितनी सर्दी है ,बच्चो का मन है ,बस तुम रोटिया बना देना..और अब बुलाया जाता श्री बुलाकी राम को जो पिताजी के आफ़िस मे खर भिश्ती पीर बावर्ची होते थे. बाहर वाले बरामदे मे शुरू होता दावत का कार्य क्रम ,अंडे,प्याज लेकर आने से,बार बार घरे के अंदर से कभी देसी घी कभी नमक कभी मिर्च कभी गरम मसाला मांग कर लाना ..जो हमे ठीक अछूतो की तरह से रसोई के बाहर दूर से थाली मे डाल कर दिया जाता.(रोटिया भी ऐसे ही मिलती थी )..देर तक लगे रहने के उपंरांत हमे सब को सब्र का फ़ल अर्थात भॊजन मिलता था जो हम वही बरामदे मे पडे तख्त पर बैठ कर करते थे..लेकिन उसका स्वाद आज तक मुंह मे पानी भर लाता है...

चिठ्ठा इतिहास