Wednesday, March 19, 2008

"प्रसिद्ध कैसे हो"की तकलीफ़देह पडताल मे जुटे अरूण के नोट्स

लेखक का किसी से कोई राग द्वेश नही है,वह तो सिर्फ़ एक फ़ैलोशिप (जो उसने बडी मुशकिल से जुगाडी है) प्रोग्राम के तहत अपनी पूरी व्यवसायिक इमानदारी से " प्रसिद्ध कैसे हो " पर जो दिखा लिखने के प्रयत्न मे है

कल आपने चमचा माह्त्य के बारे मे पढा,लेकिन हम अपने वादे के अनुसार आपको किसी की बखिया उधेडकर या किसी की खटिया खडी कर अपने को हिट की हीट नही देना चाहते ,(अगर हम अपना चमचा ब्रिगेड नही बना पाये तो काहे किसी के चमचा काकश मे खलबली मचाये),

वैसे आप इतना तो कर ही सकते है कि आप (जैसा की हमे भी बताया गया था,हमारी ब्लोगिंग के शुरुआती दिनो मे )पर हम इस पर अमल नही कर पाये,जिसके लिये १००% जिम्मेदार हमे हमारे पूर्वजो (हमारे माता पिता,इससे ज्यादा आगे मत जाये ) से मिले वो किटाणु है,जिनकी वजह से हम किसी की भी चमचागिरी नही कर पाते.ऐसा नही है कि हमने अपने आपको बदलने की कोशिश ना की हो,की बहुत की पर क्या करे सफ़ल नहॊ हो पाये.

ऐसा कई बार हुआ कि हमने अपने को समझाया देखो चमचागिरी कोई ऐसी वस्तु नही है कि तुम ना कर सको.तुम्हारे सामने ही कितने व्यक्ती चमचा गिरी कर बहुत बडॆ बडे गणमान्य व्यक्ती बन गये है और अब उनके साथ ढेरॊ चमचो की फ़ौज है,(यहा तक की कई लोगो ने तो हमे मौके भी दिये कि हम उनकी चमचागिरी की छत्रछाया मे आ जाये जिससे वो भी लाभान्वित हो और हमे भी पारितोषिक स्वरूप उपर उठने का मौका मिले) तो इसके लिये हमने कई दिन तक ढेर सारी मोटीवेशन की किताबे चाट डाली.

पर हुआ वही जिसका डर था ,हम इतने जोशो खरोश से चमचागिरी के महान कार्य को करने मे लगे कि जहा १०० ग्राम मक्खन की जरूरत थी वहा बालटियो से उडेल डाला,(नया नया मुल्ला ,अल्ला अल्ला ज्यादा करता ही है) जीतू भाइ को चैट मे कह बैठे ,कि आप तो बिलकुल ही नारद के साक्षात अवतार है ( और उन्होने तुरंत हमे चैट पर ही भैरव बाबा के दर्शनो का सुख दे दिया) ,ई स्वामी को कह दिया जी आप की फ़ोटो लगती ही नही कि आपकी फ़ोटो है लगता है जैसे हम साक्षात आपही को देख रहे है .( वो भी उसी दिन से असलियत मे उपर उठे दो सिंगो को लाकर पालिश कर हमे ही ढूढ रहे है) लिहाजा जिसको मक्खन लगा रहे थे फ़िसल कर गिरा और जब हम उठाने को आगे बढे ,अगले ने गिरे गिरे ही हाथ जोड कर हमे तुरंत चले जाने की अन्तिम इच्छा जाहिर कर दी.आज हमारी चमचो के बाजार मे इतनी पूछ है कि हमारे नाम लेते ही बंदा लट्ठ उठा लेता है

खैर ये तो हमारे साथ हुआ ,हमे नही लगता कि आप की कुंडली मे भी हमारी तरह ही चमचागिरी करने और कराने वाले घर मे राहू केतू की जोडी बैठी होगी . तो आप कीजीये वही काम जिस को करने कि सलाह हमे भी दी गई थी,यानी आप आज बल्की अभी से मेरे ब्लोग पर टिपियाने के बाद एक लिस्ट बना डाले ,सारे बडे (यानी जिन के कई चेले चपाटे हो उन की) ब्लोगर्स की ,अब आप तुरंत काम पर लग जाये ,एक एक कर ब्लोग पर जाये उनकी रचना का अध्ययन करे और टिपियादे, (समीर भाइ को इस लिस्ट से बाहर रखे उन्हे वैसे ही टीपियाने की बिमारी है ,वो रूटीन मे ही आपके ब्लोग पर टिपिया जायेगे.:))

अब आपके इस कर्म से होगा ये कि ये ब्लोगर्स दो चार दिन बाद चुपचाप आपको अपने चमचो मे काउंट करने लग जायेगे,और धीरे धीरे आप पायेगे कि आप के ब्लोग पर टिप्पणिया भी बढ रही है और आप के ब्लोग की चर्चा भी यहा वहा (जैसे चिट्ठा चर्चा मे,आपके स्वामी के साथ अखबारो मे )होने लगी है,
अपने ब्लोग को जब आज हमने खुद ही साफ़ नही रखा है तो आप भी सफ़ाई का ध्यान छोडिये और ढंग से भर कर (टिप्पणियो से)जाईये जी..:)

9 लोगों की राय:

गुस्ताखी माफ said...

अरुण के नोट!
कहां है नोट भईया?

Jitendra Chaudhary said...

ये तो सरासर चीटिंग है जी...लोगो को नोट (करारे नोट्स, अमरीकी अग्रेजी मे बोले तो बिल) दिखाकर बुलाते हो, जब बन्दा पोस्ट पढकर निबट चुकता है तो सिर्फ़ उसे नोट(बिल) की जगह बिल्लू ही दिखता है।

जीतू भाइ को चैट मे कह बैठे ,कि आप तो बिलकुल ही नारद के साक्षात अवतार है ( और उन्होने तुरंत हमे चैट पर ही भैरव बाबा के दर्शनो का सुख दे दिया
अब भैरो बाबा के दर्शन हो गए हो तो दारु चढाओ। मौका भी है, दस्तूर भी है।

अरुण said...

जीतू भाई @ खाली तगादा ही करते रहते हो,जब हम मिलने आये थे तो आप कानपुर निकल लिये थे,याद है ना,तब की बोतल अभी तक वैसी ही पडी है..:) जब आओगे तो ले लेना, खराब हो गई हो ( फ़फ़ूंद पड जाने की )हमारी गारंटी नही है..:)

संजय बेंगाणी said...

महाराज सौ ग्राम मख्खन लायें है....

संजय बेंगाणी said...

महाराज सौ ग्राम मख्खन लायें है....

Gyandutt Pandey said...

हम तो यह लेख दो बार पढ़ गये। समझ मेँ नहीं आया कि आप ने इस पोज में बतौर बहुरूपिया फोटो कैसे खिंचाई और आप को माइक्रोसॉफ्ट में नौकरी कैसे मिली?!

Suresh Chiplunkar said...

आपकी लेखनी में साक्षात सरस्वती मौजूद हैं, अगला नोबेल पुरस्कार आपको नहीं मिला तो मैं आत्महत्या कर लूंगा, इतना मक्खन बहुत है या और कुछ…

सागर नाहर said...

पहले तो ये बताओ वह था कौन जिसने आपको इस तरह तपती धूप में बिठा दिया..? लगता है उसकी शामत आई है। अरुण भाई मुझे रोको मत, मैं उसकी तो ऐसी तैसी कर दूंगा :)
हिन्दी के सबसे महान चिट्ठाकार ( जिन्हें किसी कारण से ब्लॉगर का नोबल मिलते मिलते रह गया) हमारे अरुण भाई के साथ ऐसा दुर्व्यवहार?

अरुण भाई मक्खन बस है या औरों से कम...? और हाँ आप जीतू भाई से कुछ बोतल वोतल के लिये कह रहे थे सुना है कि जितनी पुरानी होती है सुरुर उतना ज्यादा चढ़ता है?
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Sanjeet Tripathi said...

नोट :P

लगे रहो हजूर आप तो बस

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