लेखक का किसी से कोई राग द्वेश नही है,वह तो सिर्फ़ एक फ़ैलोशिप (जो उसने बडी मुशकिल से जुगाडी है) प्रोग्राम के तहत अपनी पूरी व्यवसायिक इमानदारी से " प्रसिद्ध कैसे हो " पर जो दिखा लिखने के प्रयत्न मे है
प्रसिद्ध होने के जो तरीके हमारी पास श्रंखलाबद्ध है उनमे पहला नंबर है
आपकी अपनी एक चमचा मंडली होनी चाहिये,आखिर रहीम जी ने भी इसी बात को पहचान कर आज से डेढ शताब्दी पहले ही जो कह दिया था
"रहिमन चमचा राखिये,चमचा बिन बरबाद
प्रसिद्धी राजनीती अफ़सरी,चमचे से आबाद"
अर्थात रहीम दास जी कहते है " हे प्राणी चमचा जरूर साथ रख्रे,इसके बिना आपके द्वारा किये गये महान से महान कार्य व्यर्थ है,इसके होने पर आपके द्वारा किये गये तुच्छ से तुच्छ कार्यो को भी महानता की उपाधि मिल सकती है,राजनेता,अफ़सर,और प्रसिद्धी चमचे ही आबाद करते है.
कबिरा संगत चमचे की,ज्यू फ़ागुन की बरसात
मेह पडे शीतल लगे,भूले लू की बात
इसी मुद्दे पर कबीर जी ने भी प्रकाश डालते हुये लिखा था "हे प्राणी चमचे की संगत बिलकुल ऐसी है जिस प्रकार जैसे जेठ माह की झुलसाती धूप के बाद फ़ागुन की बरसात शरीर पर पड कर शीतलता देती है,और मनुष्य लू के मौसम को भूल जाता है,ठीक उसी प्रकार मनुष्य अपने द्वारा अकेले मे किये गई अथक परिश्रम को चमचे के साथ किये गये छोटे से परिश्रम के बडे फ़ल की शीतलता मे खॊ जाता है"
नही पराग नही मधुर मधु,नही विकास इही काल
अली चमचौ नै भूल गयो,आगे कौन हवाल
महान हिंदी कवि और श्रंगार काल के प्रमुख ने भी चमचो की दीन हीन दशा पर द्रवित होते हूये लिख डाला "ना पराग और ना शहद मधुर लग रहा है,विकास कार्यक्रमो का तो कुछ पता ही नही है,जब अली अर्थात सम्राट ही चमचो को भूल गया है तो आगे किससे उम्मीद रखे"
प्रसिद्धी प्रसिद्धी सब कॊइ करै,प्रसिद्ध न होवे कोई
जो जन जानै चमचा माहत्य,प्रसिद्ध कैसे ना होई
रसखान जी ने भी इसी प्रकरण पर रोशनी डालते हुये लिखा था "सारा जंहा प्रसिद्ध होने के चक्कर मे लगा है ,पर वही प्रसिद्ध हो सकता है जो चमचो की महत्ता जानता हॊ"
"बिन गुन जोबन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि।
सुद्ध कामना के सहित,चमचा सकल रसखानि॥ "
आपको अच्छा जो शु्द्ध ह्रदय से आपकी भलाई चाहने वाला चमचा ना मिले तो,जिस प्रकार बिना गुण के योवन,रूप और धन बरबाद हो जाते है,(क्योकी तब आप बिना अपने स्वार्थ और हित को देखे निर्णय ले लेते है) आप उसी प्रकार बरबाद हो जायेगे
प्रेम अगम अनुपम अमित, सागर सरिस बखान।
जो चमचा एहि ढिग बहुरि, जात नाहिं रसखान॥
यदि आप अपने चमचे को अनुपम समझ कर उसे अपने अमित(असीमित)प्रेम दर्शा कर उसके सागर जैसे निर्मल स्वभाव का बखान यहा वहा करते रहना चाहिये, जिस चमचे को इस प्रकार रखा जाता है वो कभी आपको छोडकर नही जाता..
"इस लेख माला की अगली कडी मे हम आपको "ब्लोगजगत और चमचो का प्रयोग "सोदाहरण समझाने की कोशिश करेगे"
Wednesday, March 12, 2008
"प्रसिद्द कैसे हो"
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10 लोगों की राय:
अरूण जी,
एक वो भी दिन था जब आप ही आप हुआ करते थे.. हर जगह हर ब्लाग पर.....फ़िर गायब हो गये... अब की बार लगता है पूरे जोर के साथ प्लानिंग से आ रहे हैं.. फ़िर से छा जाने के लिये.. प्रसिद्धि के सारे मंत्र कंठ्स्थ करने के बाद... आप का स्वागत है :)
हजूर क्या धांसू आईडिए देते हो लेकिन यह भी बताओं कि चमचे कैसे बनाएं जाएं तो कुछ बात बने भी ;)
अरुण जी, 'चमचत्व' पर बढ़िया शोध प्रस्तुत किया है आपने. रहीम और कबीर जी वगैरह ने भी चमचागीरी के ऊपर इतना प्रकाश डाला है, ये आज ही पता चला. शोधकार्य जारी रहे.....:-)
हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा
:)
वाह, यह तो पर्सनालिटी डेवलेपमेण्ट विषय में पढ़ाना अनिवार्य होना चाहिये!
झांसू च फांसू है जी।
हाहाहा ! बहुत बढ़िया !
घुघूती बासूती
haa haa!!!हा हा!!! उदाहरण में नाम भी लिंक के साथ रहेंगे क्या?? और कब कैसे इस्तेमाल हुए उस पोस्ट का लिंक. होली की चिल्लम चूं में दे ही डालिये, निकल जायेगा. :)
देखिये संख्या मे बहुत ताकत होती है । 10 मूर्ख मिलकर एक विद्वान को मूर्ख साबित कर सकते हैं । तो चेले बनाने इसलिए ज़रूरी हैं । वैसे हमे भी एक दो गुर सिखा दिजिये चेला बनाने का । हमारे तो इश्टुडेंट भी चेले होने से इनकार करते हैं :-( क्या लोकतंतर है जी ।
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