Saturday, March 8, 2008

"दुर्योधन/सुयोधन का दर्द"

कल रात मेरे सपने मे महान योद्धा बडॆ भैया सुयोधन ने दर्शन दिये,वे मेरे द्वारा उनकी डायरी इस तरह सार्वजनिक करने का अधिकार शिवकुमार जी को सिर्फ़ एडसेंस के पैसे मे देने पर बडे व्यथित थे. उन्होने कहा अर्जुन तुम आज भी वैसे ही हो ! कतई नही बदले,तब भी मेरे से पांच गाव मागने चले आये थे, जबकी मै पचास गांव देने के लिये राजी था .पर तुम्हारे दूत कॄष्ण की चालो मे आकर मुझे जीवन और साम्राज्य के साथ इतिहास मे भी सुयोधन से दुर्योधन बन कर अपने नाम तक से वंचित होना पडा.ये अलग बात है कि तुम जीते पर अपने आत्मजॊ कॊ खॊकर ही ना..?

तुम कितने सीधे हो तब तुमने अपने सारे अधिकार उस कृष्ण दे दिये थे और आज भी शिवकुमार जी को दे डाले.आज भी तुम कहा हो और मै कहा..?तुम्हे आज भी किसी की मदद लेने से परहेज है ,अगर तुम मेरे से संसद मे आकर मिल लेते तो मै तुम्हे भी कोई अच्छा ठेका दिलवा देता और इस पांडूलिपी को तो किसी अच्छे प्रकाशन से छपवाता ताकी तुम्हे भी करोडो नही तो लाखॊ डालर तो मिल ही जाते,मेरे लघु भ्राता अब मुझे तुमसे कोई द्वेश नही है अगर होता तो यकीनन मै तुम्हे तब ये पांडुलिपि कतई नही देता.क्योकी मै जानता हू तब तुम उस कॄष्ण के मायाजाल मे फ़से थे.

अब यहा भी देखो,तुमसे जरा से प्यार से बतिया कर शिवकुमार जी ने इस पांडूलिपी के सारे अधिकार हथिया लिये और वोह इस पर फ़िल्म बनाने के अधिकार के लिये संजय लीला भंसाली तथा आमीर खान से मोल भाव करने मे जुटे है,तब कॄष्ण ने अपने जनसंख्या कम करो के अभियान मे तुम्हे मोहरा बनाया था.आज तुम शिव के झासे मे आकर तगडी कमाई से हाथ धो बैठे,तुम्हे तो हमेशा से कॊइ भी मछली की आख दिखा कर अपना काम करा लेता है,किसीने जरासी डींग मारी वाह अरूण क्या कंसन्ट्रेशन है तुम्हारा और तुम्हारे निशाने का तो जवाब ही नही ,बस तुमने ना कुछ देखना है ना सोचना समझना कि अगला तुम्हे धनिये के झाड पर चढाकर खुद नारियल पानी और मलाई खा रहा है.तुम तो लग गये मछली की आख देखने के चक्कर मे ,तुमने कभी ध्यान दिया की उस मछली का शोरबा किसने पिया या उसके पकोडे बनाकर कौन खा गया. इन बातो से तुमने मतलब नही रखा. मेरे प्रिय अनुज तब भी तुम्ही जीत कर लाये थे ना द्रोपदी को,पर क्या हुआ था .? वहा भी तुम अपने सीधे स्वभाव के कारण बोल नही सके और बाकी भाईयो ने मिलती मलाई मे मुंह मारते हुये कब तुम्हारे बारे मे सोचा.?

अब आलोक जी को देखो वोह तुम्हे हर निबंध या किसी भी लेखन प्रतियोगिता मे भाग लेने के लिये जरा सा प्रोत्साहित क्या कर देते है, प्रथम तुम आते हो ,लेख छापने के अधिकार उन्हे दे देते हो ? इसीलिये मै तुम्हे हमेशा राजकाज से दूर रखना चाहता था.राजकाज तुम्हारे बस की बात नही है .इसीलिये तुम आज भी एक मजदूर की तरह रोज कमाकर खा रहे हो और मै आज भी शासन कर रहा हू

अभी पिछले दिनो तुमने जो आईडिया ज्ञान जी को रेल की पटरी पर इंजन की जगह ट्रक को चला्ने का दिया था,तुम्हे तो पता भी नही मेरे अनुज ,ज्ञान जी ने उस को कोकंण रेलवे मे प्रयोग कर पदोन्नति भी पाली और तुम्हे मीठा तक भी खिलाने लायक नही समझा मेरे भाई. अब भी वक्त है सुधर जाओ,जमाने की हवा देखो उसके साथ चलने की कोशिश करो , तुम्हारा नही तो कम से कम इन बालको का जीवन तो सुधर जायेगा .अगर तुम आने वाले दिनो मे अपने आप को बदल लो, निशाना साधो ,पर हमेशा ध्यान रखो ध्येय बडा हो.अपने लिये हो अपनो के लिये हो.देखो अनुज तुम्हारे जरा से मार्ग परिवर्तन से हम दोनो मिल कर इस देश के कर्णधार बन सकते है, राजनीति शकुनी मामा की होगी चाल मेरी होगी और निशाना भी मै ही बताऊंगा बस तुम्हे सिर्फ़ और सिर्फ़ निशाना को बेधना है. आने वाला वक्त हमारा होगा ,फ़िल्म चाहे कोई बनाये ,अधिकार चाहे कोई बेचे पैसे हम वसूल लेगे मेरे प्रिय अनुज .

5 लोगों की राय:

Shiv Kumar Mishra said...

मतलब ये कि सारा दोष उस मछली का है..लेकिन एक बात कहूँगा. उस जनम में आपने निशाना केवल मछली पर लगाया था. लेकिन इस जनम में तो मछली के बहाने किसी को नहीं छोड़ा....मेरे साथ अलोक जी और ज्ञान भइया भी ढेर हुए...वैसे पांडुलिपि के बारे में एक बात बात कर लेंगे न...

और हाँ, मछली पर निशाना बैठने के बाद उसे किसी को न दीजियेगा..बहुत मंहगी बिक रही है. आख़िर बर्ड फ्लू बढ़ गया है न......:-)

Sanjeet Tripathi said...

क्या बात है, लपेट ही लिए आखिरकार!!!
मस्त!

Anonymous said...

अनुज श्री, कलिकाल में कौरव तुम्हें स्वप्न में आकर भ्रमित करेगें. इनसे बचकर रहना.

Udan Tashtari said...

बहुत सटीक..:)

Dumuro said...

See Here or Here

चिठ्ठा इतिहास