एक तरफ़ तो बलमा लगता है कि अगर रसिक ना हो तो वो बलमा होने काबिल ही नही है,यानी जो रसिक हो वही बलमा की उपाधी धारण कर सकता है,
द्सरी और हम तो यही देखते आ रहे है कि जो सज्जन बालिकाओ के विद्यालय के आगे चौपाल लगाकर रसिक प्रशिक्षण मे पारंगत होने बैठे थे,उनकी धुनाई जूत माला जलूस के बाद यही बताया जाता है कि रसिक लाल बन रहा था,यानी अगर पूरा रसिक बन जाये तो बलमा से अलंकॄत,उससे पहले फ़स जाये तो पूरे शहर का मनोरंजन करने के साथ शहर की कानून व्यवस्था संभालने वाली प्रणाली के पुलिस नामधारी कार्यकर्ताओ के चायपानी का प्रबंध कर्ता..?बहुत ज्यादती है जी
एक तरफ़ तो हमारी नायिकाये सदियो से रसिक बलमाओ के लिये गाती रही है ना..रसिक बलमाआ,हाय रे,दिल क्यू लगाया तुझसे रोग लगाया, मतलब मेरी समझ मे नही आता,अब किसने जाकर उससे कहा की रसिक से दिल लगाओ,और रोग लगाओ,खांमखा अब दवाईयो मे पैसे खर्च करो.और अगर प्रशिक्षु से लगाओ तो कौन सी बुराई है..? वहा शायद दवाईयो के पैसे भी ना खर्च हो अगला सीखने के चक्कर मे दिन रात आपके सामने रहेगा,तो रोग भी नही पकडेगा..?
और अगर वो रसिक नही है तो दिल भी नही लगाना,ये कहा का कानून है ..?
यानी अगर बंदा रसिक नही है तो उसकी तो गई भैस पानी मे,बेचारे को जैसे तैसे करके घर वालो ने जिस खूटे से बाध दिया वही आटा दाल नून तेल के जुगाड मे लगा रहे ,और इसी गम को सीने से लगाये दुनिया से फ़ना हो जाये,की हाय हम भी काश रसिक होते ,तो अपने यारो दोस्तो को हम भी कोई अपनी रसिकता का किस्सा सुना पाते,हम भी बता पाते की हमे भी किसी रीता,गीता,कविता की याद रोड जाम देख कर आई..सच मानिये दिल से इक हाय निकलती है ,काश मै एक बार वापस उस युग मे वापस चल जाऊ,अबकी चाहे पुलिस पकडे या कालेज से निकाला जाऊ,चाहे घर पे खबर जाये बापू वाकई जूत पतरम शीश मध्यम कर डाले, पर एक बार तो मै भी अपनी रसिक बनने की इच्छा पूरी कर ही लूगा,चाहे कालेज की सारी लडकियो को ही छेडना पडे,क्या पता कोई सी बलमा की उपाधी दे ही डाले,
अब आप खुद ही देखिये इस रसिक बलमा गाने वाली कन्या को किसी तिवारी से धोखा मिला है."वो जब याद आये तिवारी,सूरत वो प्यारी प्यारी,नेहा लगाकर हारी" मतलब उस तिवारी की जो रसिक है नायिका को याद आ रही है,अब उसे उसकी सूरत भी प्यारी लग रही है,इसी गम मे वो नेहा नाम की किसी वस्तू को भी बार बार लगा कर हार गई है,तो ये समझ मे नही आता कि इस तिवारी नाम के रसिक महोदय मे वो कौन सी खूबी है जो उन रसिको मे नही थी जो बेचारे कन्या विद्यालय के सामने अपकी रसिकता दिखाने के चक्कर मे पिट गये.
वैसे ऐसे दो चार रसिको को कम से कम एक ब्लोग ही बनाकर प्रशिक्षु रसिको के लिये ज्ञान बाटने का तो काम अवश्य ही कर लेना चाहिये.(समीर लाल जी से विषेश अनुग्रह.:)),टिप्पणियो से ज्यादा दुआये मिलेगी,ब्लोगिग की दुनिया से ढेरो लोग जुड जायेगे.(सारे कन्या विद्यालयो के सामने संजाल ढाबे खुल जायेगे ,देश मे रोजगार भी बढेगा)
एक तरफ़ तो महिलाये रसिकता दिखाने वाले को बलमा स्वीकार कर लेती है,दूसरी और वो इस कार्य मे संलग्न प्रशिक्षशु रसिको को मारने पीटने की धमकी देती दिखाई देती है.(यहा मै एतद द्वारा यह घोषणा करना उचित समझता हू कृपया नोट करे,इस बात का संदर्भ कही से भी कतई चोखेर बाली या उन जैसे लेखन विद्या पारंगतो की तरफ़ नही है जी)अब अगर प्रशिक्षण पूरा नही होगा तो कल बलमा बनने के लिये रसिक कहा से आयेगे,
ऐसा भी नही है की हमने कोशिश ना की हो,की थी .नई नई पडोसन पिक्चर देखी थी और साथ पढने वाले एक पूर्ण प्रशिक्षित रसिक जी को भी दिखाई थी,उनसे अपने लिये किशोर कुमार जी की तरह का बलिदान भी मांगा था .पर हाय री किस्मत ,जिस बिंदू के चक्कर मे अपनी सारी जेब खर्ची गुरु दक्षिणा मे उडा दी,हमे कार्ड बाटने का काम देकर वही बिंदू को ले उडा,और हम उनकी शादी मे मंडप से लेकर पंडित तक का काम संभालते हुये मुकेश जी का "कभी इश्क मे रकीबो को कासिद बनाते नही,खता होगई मुझसे कासिद मेरे तेरे हाथ पैगाम क्यू दे दिया"गाते रहे
पर अब वक्त निकल चुका है,समय के थपेडॊ ने चादंनी बालो के साथ चांद भी नुमाया करदी है,अब अगर हम चादनी की चाहत भी करेगे तो किसी के कतल से ज्यादा बडे गुनहगार घोषित होगे,(मुंह मे दात नही पेट मे आत नही चला है फ़टी पतंग लेकर पेंच लडाने)ऐसे मे सिवाय दूसरो के किस्से सुन कर चुपचाप दिल ही दिल मे आहे भरने के अलावा और कर भी क्या सकते है ,या सुना है कनाडा मे इस उम्र मे भी कोई रोक नही है.अब समीर जी ले चले तो वही कोशिश करके देख लेगे,शायद वही कोई बलमा बनाले..:)
Monday, March 3, 2008
"रसिक बलमा" हायरे
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12 लोगों की राय:
शानदार प्रस्तुति
शानदार,जानदार.
कनाडा वाले में तो कोई रोक नहीं है लेकिन क्या करें कनाडा में ट्रफिक जाम नहीं होता ना...;-)
बहुत खूब !
तारीफ किसकी करूँ ?
चित्र की या लेख की :)
जमाये रहो! (यह कमेण्ट तब दिया जाता है, जब सन्दर्भ बहुत स्पष्ट न हो!)
समीरलालजी को बिना लाइसेंस की बन्दूक खरीदते पाया गया है.....
यह कन्या की फोटो कहाँ से ले आये, सिक्रेट निजी मेल से बतायें.
समीरलालजी को बिना लाइसेंस की बन्दूक खरीदते पाया गया है.....
यह कन्या की फोटो कहाँ से ले आये, सिक्रेट निजी मेल से बतायें.
शानदार!!
शानदार! जानदार! धारदार!....वाह.
केवल एक बात बताईयेगा अरुण भाई. ये नीचे वाली फोटो की कॉपीराईट किसके पास है...:-)
अरे आजकल ये हो क्या रहा है ।
पहला तो आपका अनुग्रह सर आँखों पर और आप्के कनाडा वीसा के लिये स्पॉन्सरशिप लेटर भेजा जा रहा है ताकि बाकि वहीं निपटेंगे. :)
--बहुत जानदार..बहुत शानदार.
आपने अपने सारे लेख में जितनी रसिकता दिखा पाई उससे ज़्यादा तो आपके द्वारा प्रयुक्त चित्र में दिख रही है. वैसे अभी आपके लिये रास्ते बंद नहीं हैं क्योंकि आजकल तो अपने हिन्दुस्तान में भी बालों में चाँदनी झलकने के बाद किसी चाँदनी से चक्कर चलाने का फैशन चल पड़ा है :)
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