दिन बडे होने लगे है,सूरज देवता तो अब गायब होना ही भूल चुके है पर फ़िर भी धूप ज्यादा गुनगुनी हो गई है.सरदी जाने के संकेत देने लगी है . बसंत यानी मदनोत्सव आ गया है,लेकिन अब कहा का बसंत कैसा बसंत,अब कहा कोई देखने वाला रह गया है सरसो के पीले फ़ूल की छटा.अब कहा कौन आम पर आता बोर की भीनी भीनी खुशबू से सुवासित होना चाहता है. बसंती हवा अभी भी चलती है कोयल अभी भी कूकती है ,पर अब वो कान कहा..बसंती बयार को महसूस करने वाले वो दिल अब कहा..? ( इसी के विरोध स्वरूप आज कोई फ़ोटो नही)
अब आंखे तरसती है बसंत पंचमी पर आसमान मे पतंगो को देखने के लिये.पर कंम्बख्त चैनल वाले भी भूल चुके है तो और किसे याद रहेगा. सरसवती देवी की पूजा होती थी .."लडकिया प्रार्थना करती थी वर दे वीणा वादिनी वर दे" हम भी उनके समर्थन मे कहते थे "हे देवी इन्हे जल्दी से वर दे दे" इनकी शादी करादे..:) सीधी सी बात है वर तो तभी मिलेगा ना..:)
कभी हम गुनगुनी धूप मे बैठ कर पीले रंग की गरमागर्म ताहिरी खाते थे ..और छत पर दिन भर पतंग उडाने तथा डाट खाने मे लगे रहते थे.. अब वो कवि भी नही.. ना ही रही वो विरहने जो कहती थी.."बोली यो विरहिन मन को मसोस कर काहे को बसंत बस अंत अब आयो है"
लेकिन अब करेगा भी कौन बसंत की बात .ना पहले जैसी सरदी रही ,और उस पर भी लोगो ने सरदी गरमी बरसात से बचने के उपाय कर लिये है इसी लिये सरदी के बाद बसंत का आना सुखद और शहरियो के लिये दिल खुश करने वाला नही रहा..
रही बात गाव वालो की.. उसे तो सरसौ को पाला मार गया पानी का जुगाड नही हो रहा,बिजली आती नही से ही फ़ुरसत कहा है..जब हर जगह किसान आत्मह्त्या करने के जुगाड मे लगे हो तो कौन देखेगा बसंत की बयार को ..?
वो दिन हवा हुये जब सोलह श्रंगार से सजी धजी स्त्रीया अपने पदाघात से अशोक के फ़ूल खिलाती थी,अब तो माल की स्वचालित सीढीयो पर अपने १००% स्वामित्व वाले सेवक को ठेलती दिखाई देती है..
कभी बनाया होगा अकबर ने मीना बजार बसंतोत्सव के लिये.. कवियो ने लिख डाली होगी रचनाये...पर अब तो उसकी
जगह कही नही है
अब तो वेलेंटाईन का जमाना है जी माल मे जाईये फ़ूल खरीदिये चाकलेट खरीदिये और प्रेमिका को मोटरसाईकल पर बैठा कर फ़ुर्र हो जाईये. ढेर सारे होटलो ने आज वेलेंटाईन मनाने के लिये प्रायोजन किया है ..
"तू नही और सही
और नही और सही
जहा मे सितारे और भी है
तू ना पटी ना सही
किसी और को पटाने कॊ
मेरे पास गिफ़्ट और भी है"
इस वक्त मेरे पास मेरे एक मित्र की इस बारे मे एक कविता भी है तो वह भी पेशे खिदमत है..पसंद ना आये तो दाद अवश्य दीजीयेगा ताकी दुबारा ना पेश करू...:)
एक महिला की विरह वेदना..:) कवि सम्मेलन मे कविओ की तरह सस्वर पाठ कर देखियेगा अवश्य मजा आयेगा..:)
कैसे काटू दिन विरह के बालेपन मे
कैसी आई है विरह मेरे जीवन मे
अब तो बीता जाये सावन
आ जा ओ मेरे अहिरावण
सब के खसम फ़िरे है गैल
अब तो आजा सरकारी बैल
तू तो परदेश करता ऐश
अब मौका मै करूंगी कैश
इस बंगले मे पेड घनेरे
तू मरजा तो और भतेरे
कैसे काटू दिन विरह के बालेपन मे
कैसी आई है विरह मेरे जीवन मे
तेरे साथ तो होगी डाईन
मै भी ढूढू वाइलेन्टाईन
खत कुछ लिखना साझ सवेरा
कब कू करू कनागत तेरा
दुख से फ़टी जाय है छाती
आज ओ बिना सूंड के हाथी
कैसे काटू दिन विरह के बालेपन मे
कैसी आई है विरह मेरे जीवन मे
Thursday, February 14, 2008
बसंत तब और अब
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7 लोगों की राय:
जय हो पंगेबाजी की! आज आप पीले-पीले लग रहे हैं क्या बात है! आपको शुभ बसन्त और ये अन्ग्रेजों वाला हैप्पी वैलेन्टाइन्स डे.
नया ब्लॉग शुरू किया है आप प्रोत्साहन देंगें तो अच्छा लगेगा,
पता है-- http://kyastylehai.blogspot.com
पहले लगा पंगेबाज सेंटी सेण्टी हो गया है, मगर अंत आते आते राहत मिली. बिना सुंड का हाथी.. :) क्या उपमा है!! मजा आया. :)
गद्य और पद्य दोनों में जबर्दस्त
अमां आज वेलेन्टाईन्स दिन को भी पंगा?
अमां नई यार ऐसो जुलुम न करो!!
मस्त है!!
बहुत खूब,
मजा आ गया, यही है पंगेबाज सही है पंगेबाज :)
शाबाश...बहुत खूब पंगा...:)
हम तो यह सोच कर आये थे कि कुछ वेलेण्टाइनी फोटो-शोटो लगा रखी होंगी। यहां तो कविता ठेल रखी है।
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