Friday, February 1, 2008

कुछ पुरानी यादे १

साल १९८१ का था गर्मियो के दिन थे मई जा चुकी थी जून की थपेडो वाली लू रात मे भी ११/१२ बजे तक जारी रहती थी,
इटावा के एक कस्बे फ़फ़ूंद मे हम रहते थे मुख्य सडक पर सीधे जाते हुये थॊडी पहले उचाई शुरु हो जाती थी हमारा घर चढाई पर चढते हुये उलटे हाथ पर मुडते ही दूसरे नम्बर पर था अगर आप गली मे ना मुडो तो श्री राधा बल्लभ इन्टर कालेज,जिसके बाहर हमने श्री मुलायम सिंह को पहली बार एक दुसरे विधायक आनन्द जी के साथ जूतम पैजार करते हुये और उसे इनके गाल पर काटते हुये देखा था.और फ़िर थाने मे जाकर सडक खतम हो जाती थी.जहा जाकर मुलायम सिंह एक काग्रेस नेत्री को छेडने के बाद जाकर आनंद जी से पिटने से बचने के लिये छुपे थे..खैर छोडिये वो किस्सा फ़िर कभी..:)
गली मे घूमते ही १०० फ़िट से ज्यादा लम्बा बरामदा और उसमे पहले दो दरवाजे मेरे घर के फ़िर एक आंगन का और फ़िर वैसे ही दो दरवाजे मुन्ना उर्फ़ नावेद खान के घर के जहा मुहल्ले का सबसे मोटे सज्जन जो मुन्ना के अब्बू थे रहते थे आगन की दिवार लगभग ५ /५-५ फ़िट ऊची थी आखिर दोनो का मकान मालिक एक ही था आगन फ़िर ६०/७० फ़िट लम्बा और ५०/५५ फ़िट चौडा था वहा फ़िर एक बरामदा था लगभग १५ फ़िट गुणे ६०/७० फ़िट का, वहा से तीन दरवाजे फ़िर से दो कमरो के और एक अन्दर के आगंन का अब अन्दर के आगंन के साथ दो कमरे एक रसोई दो स्नानागार था एक पुराने जमाने वाला दीर्घशंकागार बाहर वाले आंगन मे बने बरामदे मे एक और दीर्घशंकागार तथा उपर छत पर जाने के लिये बिना दरवाजे वाली सीढिया थी

इस बरामदे के दूसरी और का दरवाजा खुलता था हमारे मकान मालिज हाफ़िज साहब के आगंन मे जहा एक बडी सी ड्योढी भी बनी थी ,जिस पर बैठ कर मेरी माताजी से बात करती हुई हाफ़िज चाची अकसर गरमी की शिकायत कुछ यू करती रहती ..हाय अल्ला सच मे इस बार तो बहुतै गरमी पड रही है पिछले जुम्मे को नहाये थे,और आज जुमेरात कट नही रही है..


अब आप जरा मेरे साथ वापस आ जाये बाहर बरामदे मे अरे वही सडक के साथ वाला ,जहा घर के रास्ते से जरा सा आगे मुन्ना भाइ की चार बर्बरी और दो यमुना पारी बकरिया अपने पाच सात बच्चो के साथ रहती थी
अगर अब मुन्ना भाई के घर मे घुसे तो पहले कमरे मे मुन्ना अपने सात भाईयो और एक छोटी बहन के साथ रहता था
साथ के कमरे मे गेहू की बोरिया भरी होती थी क्यो नहो मुन्ना के अब्बू भारतीय खाद्य निगम मे जो थे उससे अगले कमरे मे गेहू की जरा बडी (उचाई मे डेढ गुनी मोटाई मे दो गुनी )बोरी की तरह मुन्ना के अब्बू तख्त पर अक्सर पडे सोते रहते थे सच मानिये आते जाते के अलावा मैने कभी उन्हे खडे या बैठे नही देखा..लेकिन खर्राटे भरता हुआ आदमी अपने पास से गुजरने वाले का हाथ थामले ये भी मैने कही और आज तक नही देखा, उसके बाद आगंन,जहा मुन्ना भाई की दस बारह मुर्गिया एक अदद मुर्गे छिद्दू के साथ तीन मंजिला दड्बे के नीचे वाले तल्ले मे रहती थी.उसके ठीक उपर कबूतरो का ठिकाना और फ़िर उसके उपर दो तीतर जो मुन्ना के अब्बू की जान थे का आशियाना था..तीतर भी साहब किशमिश बादाम खाते थे..और दो लंबी लंबी बस की फ़ट्टियो के बीच रोज घुमने जाते थे..

हमारी और मुन्ना की दोस्ती बहुत पक्की थी स्कूल मे भी साथ और घर पर तो हर समय के साथी..हमे रोज सुबह चार बजे उठ कर टहलने जाने का नया नया शौक लगा था..रोज सुबह चार बजे उठते ,घर से निकलते ही मस्जिद थी मुन्ना अल सुबह मस्जिद मे जाकर अजान देता नमाज अता करता और हम निकल पडते ..यही से मेरा बिगडना शुरु हुआ मेरे घर वालो कि हिसाब से ,

तब मुन्ना के अब्बू नई हाथ घडी लाये थे जिसमे अलार्म भी था नई डिजिटल घडी बडी ची्ज थी हम लोगो के लिये ,जान की बाजी लगाकर मुन्ना ने अब्बू के तकिये के नीचे से निकाली तब हम देख पाये.. तुरंत उसमे चार बजे का अलार्म भरा गया जो छिना झपटी मे दो बजे का लग गया अगले दिन दोनो दोस्त नमाज के बाद घूमने चले गये बहुत देर हो गई दिन नही निकला कोई और आया भी नही तो समझ मे आया कि हम बहुत जल्दी आ गये थे.तुरंत वापसी की राह पकडी मस्जिद के पास आकर पता चला कि दोनो का इन्तजार हो रही है और ये माना जा रहा है कि हमने शरारत की है इतनी सुबह अजान देकर ..हम तो पतली गली से निकल लिये मुन्ना भाइ धरे गये.बाद मे पता चला मुन्ना भाई की मरम्मत हो गई थी अब्बू वहा थे और वो पहले लात फ़िर हाथ फ़िर बात मे यकीन रखते थे हमने घर आकर फ़ौरन अपनी माताजी को बताया और सो गये (अब हमारा भी नम्बर लगने वाला था)

पांच साथ मिनिट बाद मुन्ना के अब्बू की आवाज गूंज गई मेरे पिताजी के लिये. इतनी अल सुबह चार बजे हुई दोनो अब्बुओ की मिटिंग धर्म मे शरारत की शिकायत के साथ,बस अपने नाम की जोरदार आवाज गूज गई लेकिन हमारी जान बचाई माताजी ने उन्होने बाहर जाकर सही बात बताई..
वो तो हमने भाग कर डिजास्टर मैनेजमैन्ट को मैनेज कर लिया था और बढता सुनामी (तब पता नही था कि ऐसे तूफ़ान को क्या कहते है) रोक कर शान्त कर लिया गया पर फ़िर मुन्ना पर हमारा डिजास्टर मैनेजमैन्ट फ़िरसे भारी गुजरा बिचारे को दो तीन थप्पड और दो लाते और पडी साले पहले क्यू नही बोला गधे सब के सामने बेज्जती कराता रहा और घडी काहे छेडी साले सारी चीजे खराब कर के मानोगे खबरदार जॊ हाथ लगाया तो कई दिन बोलचाल बन्द रही हमारी और मुन्ना की..कारण घडी का काहे बताया थोडा सा पिट नही सकते थे तुमहारे घर मे तो वैसे ही तुम कहा पिटते हो एकी दो लप्पड तो पडते ये दोस्ती नही है..

13 लोगों की राय:

maithily said...

यानी की आपका मिजाज तो बचपन से ही पंगेबाजाना है.

सिरिल said...

बेहतरीन किस्सा है...

masijeevi said...

क्‍या बात है- यही कह सकते हैं कि 'सुधर जाओ पंगेबाज' :)

Kakesh said...

बदले बदले से सरकार नजर आते हैं..
ये कैसा पंगा है हम जान नहीं पाते हैं...

Jitendra Chaudhary said...

सही है, पुराने यादें बहुत महीन महीन डिटेल मे लिखे हो। हाफ़िज चाची सालिड बोलीं..
हाय अल्ला सच मे इस बार तो बहुतै गरमी पड रही है पिछले जुम्मे को नहाये थे,और आज जुमेरात कट नही रही है..

हम लोग जब हॉस्टल मे हुआ करते थे, आपस मे शर्त लगाते थे कि कौन कित्ते दिन नही नहाता है। तब हमारा यही जुमला होता था:
जाने कैसे लोग बिना नहाए महीना भर रह लते है, यहाँ तो उन्तीसवें दिन ही खुजली होने लगती है।

एक दोस्त की सलाह: झकास लिखते हो, ध्यान लिखने मे ज्यादा लगाओ पंगे की खुजली लेखन मे निकालो।

अनिल रघुराज said...

फफूंद कस्बे की वो गली और वो घर सभी आंखों के आगे तैर गए जैसे कोई वीडियो चल रहा हो। दिलचस्प ब्योरा है। वैसे मुलायम के कांग्रेस नेत्री को छेड़ने का मामला भी बयां किया जाए कभी। इसी तरह का एक किस्सा कानपुर में सुना था कि गंगा के किनारे एक साधू के सानिध्य को लेकर उमा भारती और अपनी साध्वी ऋतम्भरा में कैसे जबरदस्त झोटा-झुटव्वल हुई थी।

Sanjeet Tripathi said...

मस्त!!
मतलब कि बचपन से ही हैं आप पंगेबाजी मे उस्ताद!!

mamta said...

बचपन के दिन भी क्या दिन थे। :)

anuradha srivastav said...

मजेदार संस्मरण..............

संजय बेंगाणी said...

थोड़ा सा पीट जाते तो किस्से का ज्यादा मजा आता :)

बचपन में लौटा दिया साब. बहुत सुन्दर वर्णन.

Gyandutt Pandey said...

पंगेबाज; ऊपर सब चुहुल कर गये हैं। हमारे लिये यही लिखना बचा है कि बहुत अच्छा याद किया और बहुत अच्छा लिखा।

Lavanyam - Antarman said...

साथ के कमरे मे गेहू की बोरिया भरी होती थी क्यो नहो मुन्ना के अब्बू भारतीय खाद्य निगम मे जो थे उससे अगले कमरे मे गेहू की जरा बडी (उचाई मे डेढ गुनी मोटाई मे दो गुनी )बोरी की तरह मुन्ना के अब्बू तख्त पर अक्सर पडे सोते रहते थे सच मानिये आते जाते के अलावा मैने कभी उन्हे खडे या बैठे नही देखा..लेकिन खर्राटे भरता हुआ आदमी अपने पास से गुजरने वाले का हाथ थामले ये भी मैने कही और आज तक नही देखा, उसके बाद आगंन,जहा मुन्ना भाई की दस बारह मुर्गिया एक अदद मुर्गे छिद्दू के साथ तीन मंजिला दड्बे के नीचे वाले तल्ले मे रहती थी.उसके ठीक उपर कबूतरो का ठिकाना और फ़िर उसके उपर दो तीतर जो मुन्ना के अब्बू की जान थे का आशियाना था..तीतर भी साहब किशमिश बादाम खाते थे..और दो लंबी लंबी बस की फ़ट्टियो के बीच रोज घुमने जाते थे..
enjoyed this the most !

चंद्रभूषण said...

बढ़िया लिखा पंगेबाज। ब्लॉग पर ऐसी चीजें पढ़ने को आंखें तरस जाने लगी हैं अब तो।

चिठ्ठा इतिहास