Saturday, September 15, 2007

मल्लिका सेहरावत और टायर

मल्लिका सेहरावत भी आज बडा नाम है , और गुडइयर भी. दोनो को मै इतना ही जानता हू, की दोनो हरियाणा से है.. हरियाणा जहा का कभी स्लोगन हुआ करता था.."हरियाणा जहा दूध दही का खाणा" पर अब ऐसा नही है सारा दूध मदर डेयरी मे जाता है जहा से दूध दही घी पनीर बन कर दिल्ली चला जाता है ..इसीलिये मल्लिका सेहरावत इतनी दुबली रह गई है..वरना हरियाणे की जाटनी ..? पंजा लडाने मे हरा देती जी आपको..एक एक जाटनी मे चार चार मल्लिका शेरावत निकल आती जी..गुड इयर टायर की फ़ैक्टरी मेरे घर के पास है..अक्सर मै सुबह सुबह उधर से निकलता हू तो रबड जलने जैसी खुशबू (अब रोज रोज सूघनी पडेगी तो खुशबू ही कहलायेगी ना)आती है..मल्लिका को सूघने का मौका नही मिला जी मुझे आज तक..इसलिये इसी से काम चल लेते है..एक दिन मुझे लगा की मल्लिका को तो मै पास से देख नही पाया,हरियाणा मे रहते हुये..पर गुडईयर टायर को तो देख ही सकता हू..पहुच गया जी..
देखा ..छूकर देखा जी क्या फ़िनिशिंग थी क्या कटिंग थी..मूझे कई सारे टायर दिखाये गये बताया गया..की जितनी ज्यादा रबर की परत चढती है ..टायर उतना ज्यादा कीमत मे बिकता है...अरे ये तो गलत बात है जी दो प्रोडक्ट ,दोनो हरियाणा के और मार्केट मे इतना अंतर..एक की कीमत परत चढने से कम होती है तो दूसरे की परत उतरने से..मल्लिका जितने कम कपडे पहनकर फ़िल्म या स्टेज पर आती है पैसा उतना ज्यादा..
और टायर का जितना रबर लपेट दो उतना ज्यादा..बहुत नाईसाफ़ी है जी ये तो..
फ़िर तो आपका टायर अच्छा नही है जी..? नही आप गलत सोच रहे है,देखिये टायर एक बार लीजीये सालो साल चलेगा..जरा सा ध्यान रखेगे हवा ठीक रखेगे ,तो हजारो किलोमीटर चलेगा..? और इसको जब चाहे चूम सकते है जब चाहे गले मिल सकते है कोई प्रतिरोध नही करेगा..कोई पैसा नही मांगेंगा..मल्लिका का क्या है..? आप जरा सा छूने की कोशिश करोगे बिल हाजिर जी.. उन्हे रोज के हिसाब से पैसा चाहिये ..उतने मे ये एक बार मे आपका हो जायेगा..आप ध्यान से देखिये ,ये फ़ायदे का सौदा है जी.. इसे लीजिये आपकी गाडी बेरोकटोक चलेगी जी..उन्हे जरा गाडी मे बैठाकर देखिये बिना पुलिस आप एक इंच खिसक कर दिखा दीजीये टायर फ़्री..लेकिन जी अगर टायर के विज्ञापन मे मल्लिका आ जाये तो टायर के बिक्री बढ जाती है, लेकिन मल्लिका को टायर कोई लाभ नही दिला सकता..? जी गलत बात पता है आपको , हमने जब मल्लिका को टायर के विज्ञापन मे लिया हमारी तो बिक्री कम हो गई बाद मे हमने सनी देओल को लेकर घाटा पूरा किया..जब हमारे टायर ले लटक लटक कर मल्लिका ने फ़िल्म मे डांस किया वो जरूर हिट हो गई..वे बस साईकिल के टायर के लिये ठीक है..
देखिये आपका टायर जहा डाल दो जगह की कीमत कम हो जाती है,और मल्लिका ने करनाल मे जरा नजर क्या डाली वहा जमीन की कीमते आसमान छूने लगी..?अब तो वो विदेशो मे भी जा रही है..?
देखिये आप बेकार मे कनफ़्यूजन बढा रहे है..वो तो अब गई वो भी बिना पैकिंग के..और हमारा टायर सालो से विदेश जा रहा है वो भी पैकिंग खोले बिना ..जी हमारा टायर नाम पर बिकता है..? आप जरा मल्लिका जी को कपडे पहना कर कही ले जाओ कोई पह्चान भी ले तो बताना जी..
आप जरा ध्यान दीजीये हमरे टायर की गुणवत्ता पर ..अगर हमरे टायर मे पानी डल जाये तो महीनो वह साफ़ सुथरा रहता है..उसमे मच्छर पल जाते है जो इस बात की गारंटी है कि पानी साफ़ सुथरा है..चाहे तो मै दिल्ली सरकार के पेपर दिखा सकता हू ..और आप मल्लिका सेहरावत को किसी पूल के किनारे दो मिनिट खडा कर दो ,पूल मे जितना पानी नही उससे ज्यादा सिर दिख जायेगे..पानी नहाने तो छोडिये हाथ डालने काबिल नही रह जायेगा


ये हरियाणा की शान है जी और सारे देश की जान.. वे सारे जंहा की जान है पर शान के बारे मे हम कुछ नही कहेगे जी.. वो आपको रोज किसी नये के साथ किस लेती दिखाई दे सकती है पर टायर के बारे मे हमारी पूरी गारंटी है जी..जरा सा भी करेक्टर इधर उधर हो यही फ़ेक जाना जी...वहा आपको यह सुविधा नही मिल सकती है...जब आपको लगे की रबर कम हो गई है घिस गई है ले आईयेगा,फ़िर से परत चढा देगे..लो जी हो गया नया..मल्लिका का क्या करेगे..जितने कपडे वो पहनती है उससे ज्यादा पहना दिये तो कीमत कम ..और और ज्यादा वो उतार नही सकती..अगर उतार दिये तो वो कोर्ट मे होगी और आप अकेले...आप तो जी आंख बंद कर टायर ले लो ..कही कोई लफ़डा नही शांती से रहोगे..टायर लोगो तो काम करोगे ..धंधा बढेगा..? मल्लिका के चक्कर मे फ़स गये .और मिल भी गई तो दिन भर उसकी रखवाली करो..अडोसी पडोसी सारे दिन काम धाम छोडकर आपके घर से निकलने के इंतजार मे छ्ज्जो पर लटके मिलेगे..काहे आप सारे फ़रीदाबाद का काम धंधा ठप कराने की सोचते हो ..? आप तो टायर लेकर खुश रहो और उसे वही रहने दो..और हम टायर ही ले आये जी...:)

Friday, September 14, 2007

"गणपती बप्पा मोरिया,लेकिन ये क्या होरिया"

"वक्र तुंड महाकाय सुर्य कोटी समप्रभा,निर्विघ्न कुरु मम देव सर्व कार्येशु सर्वदा"
प्रात स्मरणिय देव ,जिनका नाम लेकर हर शुभ कार्य का शुभारंभ किया जाता है..जो सर्व मान्य है ..उनको पूजा के बाद इस तरह देख कर मुझे काफ़ी कष्ट हुआ है..इसी मे भागीदार बनाने के लिये आपकॊ भी आमंत्रित करता हू ..क्या यह जरूरी है..? क्या हम केवल प्रतिकात्मक छोटे से गणपती का विसर्जन नही कर सकते..ताकी आज जिनकी हम पूजा कर रहे है कल वोह कही इस रूप मे पडे हुये ना दिखाई दे..जिनसे आज हम अपने आने वाले कल को सुधारने की याचना कर रहे है..उन्हे कल इस हालत मे पहुचाने के पाप के भागीदार भी ना बने.. इन्हे देख कर आपको पहुचने वाले दुख के लिये मै क्षमा प्राथी हू...
"गणपती बप्पा मोरीया,छोड मुझे तू कही ना जा"





















Thursday, September 13, 2007

भारत और शिक्षा कोष


हमे भारत शिक्षा कोष से ढेरो शिक्षाये मिली है.पर मुख्य यह है:-

१.अगर किसी काम मे किसी मंत्री संत्री का कोई कोष ना हो तो वह कार्य कभी पूरा नही होता..

२.अगर किसी कार्य से आगे आने वाले वक्त मे भी किसी माल का जुगाड ना दिखाई दे तो वह सिर्फ़ कागजो की शोभा बढाता है

३.अगर मकसद देश के लोगो को शिक्षा देना हो तो नेताओ से लेकर देश के उद्योग पतियो तक सभी बहुत अच्छॆ अभिनेता सिद्ध होते है..पर चाहता कोई नही की ऐसी गलत बात देश मे हो..अब चाहे बात देश वासियो की हो या प्रवासी भारतीयो की...? वैसे सभी सेवा भावना से भरे है ..आप कह कर देखिये..?

इसका सबसे अच्छा उदाहरण भारत शिक्षा कोष है, बाजपेई सरकार ने जब २००१ मे प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन किया तो इसी मौके पर भारतीय शिक्षा कोष की शुरुआत की..इसके लिये भारत सरकार मे १ करोड रुपये का शुरुआती योगदान दिया..

भारत सरकार ने सभी देश वासियो और प्रवासियो से इसमे खुले हाथो से योगदान भी मांगा.. १८ दिसंबर २००१ को कैबिनेट से भी मंजूरी मिल गई ..सरकार की बात बहुत ध्यान से सुनने और गुनने के बाद चार प्रवासियो के दिल पसीजे.. उन्होने भारत देश की २५ करोड जन संख्या को पढने लिखने के लिये १६५१ रुपये प्रदान करने का महान कार्य किया..महान देश के महान लोगो की महान गाथा है ये..अगर मुहल्ले मे बच्चे होली के लिये चंदा मागंने /वसूलने निकलते है तो इससे ज्यादा धन एकत्र कर लेते है..यू पी के अधिकारी गण माया जी के जन्म दिन पर इससे लाख गुना धन एकत्र कर दिखाते है...

किसी भी सरकारी रैली के लिये इससे ५/१० हजार गुना रकम जमा होकर खर्च हो जाती है.. ? विधान सभा की कैंटीन का ठेकेदार इससे हजार गुना रकम की गाडिया गिफ़्ट मे देने की हैसीयत पा लेता है..? किसी फ़ैक्टरी के बाहर खडे बेरोजगार लोगो की भीड को पुलिस से पिटवाने का बिल इससे १००० गुना ज्यादा होता है...किसी कालेज के चुनाव मे रूलिंग पार्टी इससे ५/७ हजार गुना अपने कंडीडॆट को जितवाने मे खर्च कर देती है...

चार प्रवासी भारतीय भी भारत यात्रा मे किसी भी शाम को इससे ज्यादा का खाना खा जाते है ..किसी होटल मे बैठे चार पढे लिखे भारतीय किसी भी शाम को इससे ज्यादा का बिल चुका देते है..पर हाय री किस्मत बात पढाई की वो भी जनता की कोई कैसे चाहेगा....?

खैर अगले कई सालो सरकार विज्ञापन देती रही..९/१० जनवरी को सभी बडे बडे अखबारो मे और लोगो का ध्यान आकृषित करने के लिये बेचारी कंफ़ेडरेशन आफ़ इंडियन इंडस्ट्रीज(सी आई आई).और फ़ेडरेशन आफ़ इंडिया चैंबर्स आफ़ कामर्स (फ़िक्की) नाम की संस्था से इसके लिये कहा गया..पर कुछ नही हुआ.

आखिरकार सरकार को फ़िर से शर्म आई और उसने ०५/०६ मे नवोदय विद्यालय समिती से मदद की गुहार की उसने तरस खाकर २२,६०,८३३ रुपये इस कोष मे दान दिये..इस प्रकार भारत शिक्षा कोष के पास अब कुल मिलाकर १,२२,६२,५३४ रुपये आ गये है..लेकिन इस संस्था को अपना आडिट भी कराना पडा..अब आडित करायेगे तो आडिटर की फ़ीस भी तो देनी पडेगी..? यानी कंगाली मे आटा गीला...२७,३९० रुपये वो ले गये ..अब जो प्रचार पर फ़ुके,लोगो की तनखा भी देनी पडी वो सब अलग है... वैसे सब लोग देश सेवा मे पहले नंबर पर है..यकीन ना हो तो पूछ देखिये किसी से भी वो देश के लिये हर समय तन मन धन से सेवा के लिये तैयार है पर वही जहा मेवा मिलने के आसार हो..?

Monday, September 10, 2007

मेरी नजर से



















चिठ्ठा इतिहास