Friday, December 28, 2007

"कॄपया इतनी भी हवा ना भरे"

क्या बात है जी ..हम तो बस ज्ञान जी से ही छोटा सा पंगा लेने के मूड मे थे कि महाशक्ती ने तो हमे सिरे से ही ऊखाड दिया..भाइ नाराज ना दर असल मुझे लगा की ब्लोग जगत से कटे रहने से अच्छा है कि चित्रो के सहारे ही जुडे रहो..लेकिन आपकी बात सिर माथे पर लीजीये ताजे ताजे रहीम जी के दोहे पढिये जो हमे उन्होने रात सपने मे सुनाये थे,...
"रहिमन नये विचार ते जडमत होत सुजान
बूढो जब तक सोच करे,नयो काट ले कान"

अर्थात रहीम दास जी कहते है.नये विचारो और नये लोगो की हमेशा कद्र करो,उससे आने से जडबुद्धी भी सुजान यानी चतुर हो जाता है..जब तक पुराने यानी बडे बुजुर्ग कुछ करने से पहले सोच विचार मे उलझे रहते है नया बंदा कान काट कर मतलब अपना कार्य कर चला जाता है...

"कह रहीम निज संग लै, जन्मते लीडर न कोय
लूट खसौट मारकाट सब,सीखत सीखत होय"

अर्थात रहीम दास जी कहते है की हे मनुष्य जन्म से कोई लीडर नही होता,कोई अपने साथ नेतागिरी का गुण लेकर पैदा नही होता,वह तो यहॊ इस दुनिया मे लूट खसौट,अपहरण बलात्कार हत्या सब सीख सीख कर बनता है..अर्थात तू डर मत शुरू होजा अभी भी देर नही हुई है,तू नेता बनने के अभ्यास मे लग नेता बन सकता है...


"भीत गिरी पाखान की, मच ग्यो रे कोहराम
कह रहीम सुजान वहै, बेचे प्लाट वही ठाम"

अर्थात रहीम दास जी कहते है जब पुराना मकान गिरा तो वहा शोर मच गया लोग दब गये.लेकिन इस हाहाकार मे भी वही सुजान है जो उसी वक्त वहा प्लाट काट बेच कर पैसा जेब मे लेकर निकल लिया...


ज्ञान दादा अब इतनी भी हवा ना भरे कि...

मेरा हाल ऐसा हो जाये..


मै तो बस कोशिश यही करता हू कि ...

अब ये खिचे ना खिचे अलग बात है..पर कोशिश तो मै करना जारी रखुगा...:)

एक अच्छे पूर्ण समर्पित ब्लोगर की तरह...


अपने से बडा काम करने की..(पंगा ही सही)


पत्थरो से भी करा लेते है लोग अपनी मर्जी से काम..बस जरूरत है धैर्य और अभ्यास की



कर दिया ना उलटा खडा..

भूल गया अपना वजन .और गुरुत्वाकर्षण का नियम...



क्या बैलेंस है..काश हम भी जिंदगी मे ऐसा कर पाते....

लेकिन ये जो सज्जन है उपर और नीचे इन्हे पत्थरो कॊ भी उंगलियो पर नचाने की आदत जो है...

7 लोगों की राय:

mahashakti said...

वाकई अच्‍छे चित्र है।

सच कहूँ तो आपके ब्‍लाग पर आने का मन इसलिये करता है कि कुछ अच्‍छा पढ़ने को मिलेगा किन्‍तु हर बार निराशा हाथ लगती है, और इस बार भी यही हुआ।

मुझे नही लगता कि पंगेबाज की प्रकृति पर यह चित्र अच्‍छे लगते है? क्‍योकि इस माह आपने 12 पोस्‍ट की है जिनमें से 10 चित्रमय थी। पंगेबाज को पंगेबाज रहने दीजिऐ मजाक मत बनाइये।

दिल की बात कह रहा हूँ, बुरा मत मानिऐगा।

mahashakti said...

आपने मेरी बात रखी, मुझे अच्‍छा लगा :)

आपकी पोस्‍ट में ज्ञान जी नही फँसे तो उन्‍हे फँसाने की जिम्‍मेदारी मेरी। :)

ALOK PURANIK said...

ये आपके वाले रहीमदासजी कौन से हैं, जो कई सदियों पहले लीडर शब्द का प्रयोग अपने दोहे में करने लगे थे।
प्रभो रहीमदासजी से भी पंगा ले रहे हैं क्या।

संजय बेंगाणी said...

कमाल कर दिया जी, मस्त दोहे और झनाटेदार चित्र.

Shiv Kumar Mishra said...

अरुण जी,

जुड़े रहना जरूरी है....चाहे फोटो के जरिये ही सही....वैसे भी जो फोटो आप दिखाते हैं, वो सारे जबरदस्त होते हैं..
अब 'रहीम' का ये दोहा पढिये जो उन्होंने अभी-अभी लिखा है...

फोटो सोटो ही सही, पोस्ट ब्लॉग पर डाल
ब्लागिंग चलनी चाहिए, जलती रहे मशाल

ज्ञानदत्त पाण्डेय । GD Pandey said...

अरे अरुण पहले चित्र में हवा किससे भरवा रहे हो? महाशक्ति से! मेरे पास तो ऐसी रंगबिरंगी टोपी है नहीं! :-)

दिनेशराय द्विवेदी said...

अदभुत् ज्ञान भरा पड़ा है दोहों मे। सचमुच रहीम को उतार लाए। और ये चित्र? इन की सचाई पर यकीन ही नहीं हो रहा है।

चिठ्ठा इतिहास