Wednesday, December 12, 2007

रसखान का दर्द

लेफ़्ट ते राईट ,सोनिया ते लालू सारे मोदी नू गरियावै
अनादी अनामी अनंत अखंड ,मौत को सौदागर बतियावै
जो देश को खंड विखंड करे को दिल मे मंसुबे है बनावै
कही जेठमलानी संग खडे,कही भट्ट साथ खडे हर्षावै
देश,जनादेश लूट ये नेता अफ़जल संग है पेंग बढावै
सौहराबुद्दीन कौ गम है कितनो,चौरासी कभु याद ना आवै
बिजली दिल्ली मै गायब , गुजरात मे कितनो बाटनो चाहवै
विद्रर्भ मे मर गये ढेरो ,गुजरात मे किसनो बचानो चाहवै
देश कौ देखे महाकाल अबै,इननै तो गुजरात ही चाहवै
कालिया को भरोसो घणौ भलो ,इनते या रसखान ना चाहवै
जे देश चलाईबे की बात करै,बात भरोसो काई ना आवै
वापै इनकी अध्यक्षा ,छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं

16 लोगों की राय:

अरुण said...

क्या पता जी लोग भूल गये हो...?
कोई करे ना करे तो हम खुद ही कर लेते है टिपियाने का काम ,आखिर समीर भाई तो छुट्टी पर है ना...
बढिया है लिखते रहे...
कैसी रही...:)

Aflatoon said...

आप की बोहनी कैसी है,कल पता चलेगा ।

ज्ञानदत्त पाण्डेय । GD Pandey said...

वाह! पंगेबाज का पुनर्जन्म रसखान के अन्दाज में। पुनर्जन्म की बधाई मित्र।

संजय बेंगाणी said...

बहुत खुब. बहुत दिनो बाद लौटे मगर रंग में लौटे.

Sanjeet Tripathi said...

क्या बात है, बड़े दिन बाद लौटे आप, और लौटे भी तो एकदम रंग में!!
गुड है जी!!

mahashakti said...

अच्‍छी इन्‍ट्री है और उससे अच्‍छी पोस्‍ट बधाई

maithily said...

वापसी की बधाई एवं स्वागतम
आपको कौन भूल सकता है? कोई भी तो नहीं

Kakesh said...

जब जब भीड़ लगी ब्लॉगर की, पंगेबाज को भूल ना पाये
इसीलिये अपनो पंगेबाज, फिर से मैदान में वापस आये.

बधाई हो जी.

अभय तिवारी said...

चलिए आप लौटे तो सही..!

Shashi said...

आपका स्वागत है । यह आने का अन्दाज भी अच्छा लगा ।
घुघूती बासूती

संजय तिवारी said...

कल ही आपके ब्लाग को चिट्ठाजगत पर देखते हुए सोच रहा था कि ब्लागजीवी आजकल कहां हैं. आज आप हाजिर. अच्छा लगा. सोचने पर नहीं आपके पुनर्लेखन पर.

अनिल रघुराज said...

ऱसखान का नाम लेकर आपने अच्छा पंगा लिया है। एंट्री शानदार है। बस पलड़ा मोदी की तरफ ज्यादा झुक गया है। असल में राजनीति में सच भी आज सापेक्ष हो गया है। वैसे, सत्ता के खेल में तो हमेशा नरो व कुंजरोवा का सच शंख के नाद में दबाने की परंपरा रही है।

yunus said...

वाह वाह भैया पंगेबाज़

अच्‍छा लगा आपका अंदाज़

गुम हो गये थे न जाने कहां

याद कर रहा था सारा जहां

क्‍या बताएं आपको शायद नहीं हो खबर

रविवार को मुंबई में सबने याद किया जी भर

अब आ गये हो तो ये करो वादा

कभी ना जाओगे खेल छोड़कर आधा

पंगेबाज ना हो तो ब्‍लॉग जगत लगता है सूना

जैसे पान हो चकाचक पर गायब हो चूना

सिरिल गुप्ता said...

आपके लिखने का तरीका हमेशा की तरह इम्प्रेसिव था. फुर्सत मिले तो लिखते रहें.

masijeevi said...

इससे पहले की हमारी तरफ भी से आप खुद टिप्पिया लें...हम बता दें कि हमने पढ़ लिया है।

सागर नाहर said...

हमने भी देर सबेर पढ़ लिया है और बहुत पसन्द आया है।
:)

चिठ्ठा इतिहास