Friday, September 14, 2007

"गणपती बप्पा मोरिया,लेकिन ये क्या होरिया"

"वक्र तुंड महाकाय सुर्य कोटी समप्रभा,निर्विघ्न कुरु मम देव सर्व कार्येशु सर्वदा"
प्रात स्मरणिय देव ,जिनका नाम लेकर हर शुभ कार्य का शुभारंभ किया जाता है..जो सर्व मान्य है ..उनको पूजा के बाद इस तरह देख कर मुझे काफ़ी कष्ट हुआ है..इसी मे भागीदार बनाने के लिये आपकॊ भी आमंत्रित करता हू ..क्या यह जरूरी है..? क्या हम केवल प्रतिकात्मक छोटे से गणपती का विसर्जन नही कर सकते..ताकी आज जिनकी हम पूजा कर रहे है कल वोह कही इस रूप मे पडे हुये ना दिखाई दे..जिनसे आज हम अपने आने वाले कल को सुधारने की याचना कर रहे है..उन्हे कल इस हालत मे पहुचाने के पाप के भागीदार भी ना बने.. इन्हे देख कर आपको पहुचने वाले दुख के लिये मै क्षमा प्राथी हू...
"गणपती बप्पा मोरीया,छोड मुझे तू कही ना जा"





















13 लोगों की राय:

mahashakti said...

सार्थक बात उठाई है।

इस मामले में जनता और सरकार को सोचना चाहिए अस्‍था के साथ खिलवाड़ न हो।

ALOK PURANIK said...

गणपति बप्पा मोरिया,
बिलकुल ठीक तो होरिया
पंगेबाज तो बेमतलब की पंगेबाजी खोरिया
अईसी पोस्ट लिखते रहे तो
बाकी ब्लागर बांधे बोरिया
उठकर जल्दी घूमने जा
बिस्तर पर क्यों सोरिया

CyrilGupta said...

बहुत अच्छा लेख है अरुण जी. गणेश चतुर्थि के दिन हजारों लोग गणेश जी को प्रसन्न करने के लिये पूजा-अर्चना करते हैं. और फिर जिनको पूजा उन्हीं का ये हाल किया? इससे गणेश क्या प्रसन्न होंगे? सत्य है, ये बेहतर होता की मूर्तियां छोटी होतीं और पानी में घुलनशील होतीं.

Suresh Chiplunkar said...

कई सामाजिक आंदोलनों का अगुआ रहा महाराष्ट्र और मराठी लोग चाहे-अनचाहे बड़ी मूर्तियों की होड़ में फ़ँसते जा रहे हैं, हालांकि विरोध के स्वर उठ रहे हैं, लेकिन अभी वे कमजोर हैं और नेतागिरी के आगे बेबस हैं, लेकिन घरों में इसकी शुरुआत हो चुकी है, छोटी मूर्तियाँ लाई जायें, एक बड़ी बाल्टी में उनका विसर्जन किया जाये, फ़िर उस जल का उपचार करके उसे पौधों को डाल दिया जाये यह मुहिम शुरु हो चुकी है, सार्वजनिक मंडलों को अकल आने में अभी समय लगेगा...

Neeraj नीरज نیرج said...

करता है तू पंगे-वंगे
पंगे कर खुश तू होरिया?
बुद्धिभ्रष्टक टॉनिक पीकर
काहे तू है डोल रिया?
मांगो लंबोदर से थोड़ा ब्रेन
वरना बांध ले बोरिया
गणपति बप्पा मोरिया
बोलो गणपति बप्पा मोरिया



सही रचना.. बधाई..पर्यावरणीय संतुलन आवश्यक है.. गणपति गणदेव है.. गणाधिपति हैं.. मज़े की बात यह है कि वे बेहद सहिष्णु है.. बच्चों के प्रिय.. हम सब के प्रिय गणपति.. सबको बुद्धि-विवेक दें. मुझको और पंगेबाज़ को भी.

Dr Prabhat Tandon said...

बिल्कुल सही बात उठयी है ! आस्था का खुला मजाक ! इसी तरह मुझे दिवाली पर भी गणेश-लक्षमी जी की मूर्ति को खुले पानी मे प्रवहित करना या किसी पेड के नीचे छोड देना बिल्कुल भी सही नही लगता । क्यों नही हम प्रतीकात्मक रुप मे metal की मूर्ति का प्रयोग शुरु करते , हर साल एक ही मूर्ति को साफ़ कर उसका प्रयोग कर सकते हैं ।

Gyandutt Pandey said...

सही बात. मूर्ति विसर्जन का कर्मकाण्ड समाप्त होना चाहिये.

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi said...

न केवल गणपति विसर्जन बल्कि अन्य मुर्ति विसर्जनॉं पर भी लागू होती है यह टिप्पणी. दशहरा आने वाला है. दुर्गा पूजा पर भी मूर्तियों के इस प्रकार विसर्जन किये जाने पर व्यवस्था लागू होनी चाहिये.

mamta said...

वैसे इस बार तो गणेश जी की मूर्ति की ऊंचाई पर कुछ रोक लगी है।
ये भगवान और आस्था दोनो का ही मजाक है।

Neelima said...

बहुत सही लिखा और दिखाया है !

Rajesh Roshan said...

बहुत बढ़िया लेख और सही विषय . लेकिन मराठियो के साथ हम सभी मूर्ति पूजा करने वालो को इस बारे में सोचना चाहिए

अजय यादव said...

अरुण जी!
बहुत ही सही लिखा है आपने. अक्सर हम जिन मूर्तियों, चित्रों आदि को पूजा में उपयोग करते हैं; आयोजन समाप्ति के बाद उन्हें इसी तरह विसर्जन के नाम पर बेइज़्ज़त करते हैं. मूर्तियों के अतिरिक्त घरों व दुकानों में प्रयुक्त चित्रों का भी हश्र ऐसा ही होता है बल्कि इससे भी बुरा. मेरे विचार से जब यह परंपरा शुरू हुई थी तब मूर्तियाँ कच्ची मिट्टी की बनाई जातीं थीं. (आज भी यह प्रथा कुछ अंश में जीवित है) इसके अतिरिक्त नदियों की हालत भी बेहतर थी. इससे मूर्तियाँ पानी में घुल जातीं थीं. परंतु अब बदले हुये परिवेश में इस का कोई औचित्य नहीं रह जाता.

Udan Tashtari said...

सही मुद्दा उठाया है. वाकई विचलित करने वाली बात है. इस पर रोक लगना चाहिये.लिखते रहो, आवाज उठाते रहो. :)

चिठ्ठा इतिहास