हमे भारत शिक्षा कोष से ढेरो शिक्षाये मिली है.पर मुख्य यह है:-
१.अगर किसी काम मे किसी मंत्री संत्री का कोई कोष ना हो तो वह कार्य कभी पूरा नही होता..
२.अगर किसी कार्य से आगे आने वाले वक्त मे भी किसी माल का जुगाड ना दिखाई दे तो वह सिर्फ़ कागजो की शोभा बढाता है
३.अगर मकसद देश के लोगो को शिक्षा देना हो तो नेताओ से लेकर देश के उद्योग पतियो तक सभी बहुत अच्छॆ अभिनेता सिद्ध होते है..पर चाहता कोई नही की ऐसी गलत बात देश मे हो..अब चाहे बात देश वासियो की हो या प्रवासी भारतीयो की...? वैसे सभी सेवा भावना से भरे है ..आप कह कर देखिये..?
इसका सबसे अच्छा उदाहरण भारत शिक्षा कोष है, बाजपेई सरकार ने जब २००१ मे प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन किया तो इसी मौके पर भारतीय शिक्षा कोष की शुरुआत की..इसके लिये भारत सरकार मे १ करोड रुपये का शुरुआती योगदान दिया..
भारत सरकार ने सभी देश वासियो और प्रवासियो से इसमे खुले हाथो से योगदान भी मांगा.. १८ दिसंबर २००१ को कैबिनेट से भी मंजूरी मिल गई ..सरकार की बात बहुत ध्यान से सुनने और गुनने के बाद चार प्रवासियो के दिल पसीजे.. उन्होने भारत देश की २५ करोड जन संख्या को पढने लिखने के लिये १६५१ रुपये प्रदान करने का महान कार्य किया..महान देश के महान लोगो की महान गाथा है ये..अगर मुहल्ले मे बच्चे होली के लिये चंदा मागंने /वसूलने निकलते है तो इससे ज्यादा धन एकत्र कर लेते है..यू पी के अधिकारी गण माया जी के जन्म दिन पर इससे लाख गुना धन एकत्र कर दिखाते है...
किसी भी सरकारी रैली के लिये इससे ५/१० हजार गुना रकम जमा होकर खर्च हो जाती है.. ? विधान सभा की कैंटीन का ठेकेदार इससे हजार गुना रकम की गाडिया गिफ़्ट मे देने की हैसीयत पा लेता है..? किसी फ़ैक्टरी के बाहर खडे बेरोजगार लोगो की भीड को पुलिस से पिटवाने का बिल इससे १००० गुना ज्यादा होता है...किसी कालेज के चुनाव मे रूलिंग पार्टी इससे ५/७ हजार गुना अपने कंडीडॆट को जितवाने मे खर्च कर देती है...
चार प्रवासी भारतीय भी भारत यात्रा मे किसी भी शाम को इससे ज्यादा का खाना खा जाते है ..किसी होटल मे बैठे चार पढे लिखे भारतीय किसी भी शाम को इससे ज्यादा का बिल चुका देते है..पर हाय री किस्मत बात पढाई की वो भी जनता की कोई कैसे चाहेगा....?
खैर अगले कई सालो सरकार विज्ञापन देती रही..९/१० जनवरी को सभी बडे बडे अखबारो मे और लोगो का ध्यान आकृषित करने के लिये बेचारी कंफ़ेडरेशन आफ़ इंडियन इंडस्ट्रीज(सी आई आई).और फ़ेडरेशन आफ़ इंडिया चैंबर्स आफ़ कामर्स (फ़िक्की) नाम की संस्था से इसके लिये कहा गया..पर कुछ नही हुआ.आखिरकार सरकार को फ़िर से शर्म आई और उसने ०५/०६ मे नवोदय विद्यालय समिती से मदद की गुहार की उसने तरस खाकर २२,६०,८३३ रुपये इस कोष मे दान दिये..इस प्रकार भारत शिक्षा कोष के पास अब कुल मिलाकर १,२२,६२,५३४ रुपये आ गये है..लेकिन इस संस्था को अपना आडिट भी कराना पडा..अब आडित करायेगे तो आडिटर की फ़ीस भी तो देनी पडेगी..? यानी कंगाली मे आटा गीला...२७,३९० रुपये वो ले गये ..अब जो प्रचार पर फ़ुके,लोगो की तनखा भी देनी पडी वो सब अलग है... वैसे सब लोग देश सेवा मे पहले नंबर पर है..यकीन ना हो तो पूछ देखिये किसी से भी वो देश के लिये हर समय तन मन धन से सेवा के लिये तैयार है पर वही जहा मेवा मिलने के आसार हो..?
Thursday, September 13, 2007
भारत और शिक्षा कोष
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7 लोगों की राय:
:) हा हा!! बड़े मूर्ख हैं जो सिर्फ़ एजूकेशन के पीछे पड़े है..कोई समझाओ इन्हें.
भारतीय शिक्षा कोष में एनआरआई समुदाय की तरफ से महज 1651 रुपए का योगदान। ये तो वाकई बेहद चौंकानेवाली हकीकत है।
श्रीलाल शुक्ल ने लिखा है रागदरबारी में- हमारे देश की शिक्षा नीति रास्ते में पड़ी कुतिया है जिसे जो मन आता है लात लगा देता है। एक लात यह भी है।
ये है सरकारी सम्मान पाने वाले अप्रवासी भारतीयों की राष्ट्रभक्ति की हकीकत!
वो कहते है ना नाम बडे और दर्शन छोटे।
भारत तो विश्व को शिक्षित कर चुका है - आदिकाल से. अब फण्ड काहे को?!
चौपटीकरण के मामले में स्वदेशी होना चाहिए। बाहर वालों के सपोर्ट से चौपट किया, तो क्या खाक चौपट किया।
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