Monday, September 10, 2007

मेरी नजर से



















21 लोगों की राय:

काकेश said...

आनन्दम.

हम तो ले लिये थे अपना डब्बा साथ में नमकीन भी थी.आपने ली क्या नमकीन?

maithily said...

भैय्ये, आप अपना डिब्बा खाली करके छोड़ गये और हमारा भरा भराया डिब्बा लेकर चले गये.
कब लौटा रहे हो?

अभय तिवारी said...

इस में भी पंगा..

Rajesh Roshan said...

मजेदार, पंगा लेना तो कोई आपसे सीखे :) :)

वैसे आपने एक ही डब्बा क्यों दिखाया जब फुरसतिया जी सब के लिए २-२ लेकर आए थे

Jitendra Chaudhary said...

सही है,
लड्डू कैसे लगे? उस बारे मे भी तो लिखो।
फोटो का कवरेज तो हो गया, अब पूरा विवरण कौन लिख रहा है?

इस तरह के मेल मुलाकात हम सभी को एक दूसरे के और पास लाते है, ये जरुरी है।

Pratik said...

वाह! फ़ोटू देखकर और साथ में आपकी ज़बरदस्त टिप्पणियाँ पढ़कर मज़ा आ गया। :)

हरिराम said...

कहते हैं एक चित्र हजार शब्दों के बराबर होता है। यहाँ को इतने सारे चित्र हैं! सम्पूर्ण विवरण स्वतः स्पष्ट हो जाता है। कम्प्यूटर की दृष्टि से तो एक चित्र लाखों शब्दों के बराबर होगा, क्योंकि कई किलोबाईट्स का स्पेस जो ले लेता है।

संजय बेंगाणी said...

फूर्सतियाजी ने हमारे लिए लाये लड्डू आपको कूरियर करने को कहा था, मिले नहीं... कृपया भेज दें. :)

फोटो और टिप्पणीयाँ मजेदार रही. भड़ास पर फुरसतिया लेख भाषा की तमाम उंचाईयों के साथ कब आ रहा है? :)

Amit said...

अरूण जी, आप मेरा डब्बा संभाल लिए ना? बताईये कब आउँ लेने? :D यह मत भूलिएगा कि फरमाईश मैंने की थी, तभी सबको लड्डू नसीब हुए, इसलिए मेरा हिस्सा 1-2 का 4 मत करना वरना अगली बार फुरसतिया जी नहीं लाएँगे!! ;)

Pramod Singh said...

बहुत बुरा लग रहा है.. मेरे लिए एक भी डिब्‍बा नहीं?..

Sanjeet Tripathi said...

शुक्रिया फोटो दिखाने के लिए!!

अब विवरण की प्रतीक्षा रहेगी!!

संजय तिवारी said...

चुपके-चुपके आप अपना स्टिंग आपरेशन कर रहे थे. पता ही नहीं चला.

कृपा शंकर said...

मजा आ गया चित्र और परिचय का संयोजन देखकर। मगर अफसोस भी कि काश मैं भी वहां होता।

आशीष said...

शुक्रिया फोटो दिखाने के लिए!

Mired Mirage said...

प्रमोद जी को डब्बा दे दीजिये और हमें लड्डू !(Pramod Singh said...
बहुत बुरा लग रहा है.. मेरे लिए एक भी डिब्‍बा नहीं?.. )

घुघूती बासूती

Amit said...

PS: कहना भूल गए थे, हमार डब्बे में लड्डू भी होने चाहिए ठग्गू के। यदि आप डब्बा रखना चाहें तो कोई बात नहीं, पहले बता दीजिएगा तो लड्डू ले जाने के लिए अपने घर से डब्बा ले आऊँगा!! :)

अनूप शुक्ला said...

सही है। बाकी के फोटो भी डालो भाई!

Udan Tashtari said...

ये यही प्रदर्शनी लगी-मय फोटो विवरण के. कुछ लड्डू फ्रिज में रख लो अगर दो महिने चल जायें तो. :)

ALOK PURANIK said...

वैसे अब बता रहा हूं फुरसतियाजी ठग्गू के लड्डू के ग्यारह डिब्बे सिर्फ मेरे लिये लाये थे। वो मैं ले आया हूं।
फुरसतियाजी ने ताकीद की थी कि किसी को बताना नहीं। सो बता नहीं रहा हूं। बस यूं हलके से सरका रहा हूं।
और भईया पंगेबाजजी, आप तो हमारे मित्र हैं, हमारे व्यंग्य का खोमचे को आपसे खतरा सा होने लगा है, हाय हाय ऐसी टिप्पणियां। गुरुवर बिजनेस पर ध्यान दो, हमे ठग्गू के व्यंग्य बेचने दो।

राकेश खंडेलवाल said...

दो महीने के बाद वसूलेंगे सारा कुछ ब्याज सहित हम
दीवाली की गुझिया भी तो लड्डू के संग खानी होगी
शानू जी की कविता से बचने का है उपाय बस इतना
उनसे पहले अपनी कविता आकर हमें सुनानी होगी

उन्मुक्त said...

बढ़िया

चिठ्ठा इतिहास